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भाजपा के त्रिपुरा में जीत के मायने

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नई दिल्ली – भाजपा ने त्रिपुरा में पच्चीस साल के वामपंथी शासन का अंत कर पूर्ण बहुमत हासिल किया भाजपा के इस अप्रत्याशित जीत ने भाजपा के विरोधी खेमे की नींद उड़ा दी है। विपक्ष इस बार ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप भी नहीं लगा पाया है क्योंकि चुनाव आयोग ने त्रिपुरा इलेक्शन में इस बार वीवीपैट का इस्तेमाल किया था।

त्रिपुरा की जीत भाजपा के लिए खास मायने रखती है पहली बार भाजपा और सीपीएम का सीधा मुकाबला था , एक दक्षिणपंथी और एक वामपंथी दल का सीधा मुकाबला। दोनों ही पार्टी कैडर बेस पार्टी है दोनों की अपनी विचारधारा है जो करीब-करीब एक दूसरे के विपरीत हैं। पहली बार देश में सही मायनों में दो विचारधाराएं भी चुनाव लड़ रही थी।  दक्षिणपंथी विचारधारा ने वामपंथी विचारधारा को मात दे दी ये हार कई मायनों में खास है

गोपाल कृष्ण अग्रवाल , भाजपा , प्रवक्ता

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल ने कहा कि मैंने खुद त्रिपुरा चुनावों में कई रैलियों को सम्बोधित किया है और चुनाव प्रचार के दौरान में वहां के ज़मीनी हालातों से परिचित हुआ , उन्होंने बताया कि सीपीएम ने अपने पच्चीस साल के शासन नें पूरे राज्य में कहीं विकास नहीं किया है हमने त्रिपुरा के निवासियों से विकास का वादा किया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर पूर्व के राज्यों का लगातार दौरा कर रहे हैं जिससे साफ होता है कि सरकार के एजेंडे में भी उत्तरपूर्व के राज्यों की खासी अहमियत है गोपाल अग्रवाल का कहना है कि सरकार की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिए भी उत्तरपूर्व के राज्य बहुत महत्वपूर्ण हैं। भाजपा ने जहां 2013 में त्रिपुरा हुए इलेक्शन में भाजपा को 1.5 प्रतिशत मत मिले थे वहीं इस बार हुए इलेक्शन में भाजपा को करीब 50 प्रतिशत मत मिले हैं।

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जीत में संघ की भूमिका

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विभिन्न आनुषांगिक संगठन उत्तरपूर्व के राज्यों में काफी सक्रिय है विद्याभारती और वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों ने धीरे धीरे इस विशाल जीत की नींव तैयारी की । संघ के प्रचारक रहे सुनील देवधर और प्रदेश अध्यक्ष विप्लव देव ने पूरी कुशलता के साथ संगठन को खड़ा किया और सीपीएम के कैडर को मात दी ।

वामदलों के लिए क्यों घातक है ये हार

वामदल अपने गढ़ पश्चिम बंगाल को पहले ही ममता बनर्जी के हाथों गवां को चुके है भाजपा ने त्रिपुरा को छीन लिया । भाजपा के हाथों त्रिपुरा हार जाना वामपंथियों को केरल में भी कमजोर करेगा। भाजपा और संघ कार्यकर्ता अब पूरे जोश के साथ केरल में काम करेंगे। भाजपा की सरकार बनने के साथ ही केरल में संघ की शाखाओं में अचानक वृद्धि देखने को मिली थी जो अब त्रिपुरा हार के बाद दोबारा से देखने को मिल सकती है।

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