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वो जनरल जिससे डरते थे दुश्मन उन्हें भुला दिया गया

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राहुल तालान-एक ऐसा सेनानायक जिसको जो भी लक्ष्य दिया गया उसने उससे आगे बढ़ कर सफलता हासिल की । अपनी धुन के पक्के थे लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह, उनकी यही लगन उन्हें जबरदस्त सेनानायक बनाती थी ।

दिनांक 16 दिसम्बर 1971 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर जबर्दस्त विजय हासिल की थी ।ढाका में पाकिस्तान सेना के 93000 सैनिको ने भारतीय सेना के समक्ष हथियार डाल दिए थे , जिससे एक नए देश बांग्लादेश का उदय हुआ था , इस विजय के नायक थे लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह , जिन्होंने इस युद्ध में भारतीय सेना के अभियान का नेतृत्व किया था , लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह भारतीय सेना के सबसे कामयाब सेनानायक रहे हैं , उन्हें जो भी लक्ष्य दिया गया इन्होने उससे बढकर परिणाम दिए । वे हमेशा आगे बढकर नेतृत्व करते थे और अपने सैनिको का हौसला बढ़ाते थे ।

सगत सिंह जी का जन्म 14 जुलाई 1919 को बीकानेर में बृजपाल सिंह के यहाँ हुआ था सगत सिंह बचपन से देशप्रेमी थे और सेना में जाना उनका सपना था । स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हुए ही उन्होंने इंडियन मिलेट्री एकेडमी ज्वाइन कर ली और उसके बाद बीकानेर स्टेट फ़ोर्स ज्वाइन कर ली । दूसरे विश्व युद्ध में इन्होने मेसोपोटामिया,सीरिया,फिलिस्तीन के युद्धों में अपना जौहर दिखाया ।
सन 1947 में देश आजाद होने के बाद उन्होंने भारतीय सेना ज्वाइन करने का निर्णय लिया और सन 1949 में उन्हें भारतीय सेना में कमीशंड ऑफिसर के रूप में 3 गोरखा राइफल्स में नियुक्ति मिल गई।
1955 में सगत सिंह को लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में 2/3 गोरखा राइफल्स की कमान दी गई। गोरखा राइफल्स में इससे पहले सिर्फ ब्रिटिश ऑफिसर्स ही तैनात होते थे और ब्रिटिश यह मानते थे कि गोरखा सैनिकं भारतीय सेनानायक का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेंगे ।किन्तु यह आशंका निर्मूल साबित हुई  और गोरखा सैनिको का सगत सिंह ने बखूबी नेतृत्व किया। इसके बाद इन्हें 3/3 गोरखा राइफल्स का भी नेतृत्व दिया गया ।
वर्ष 1961 में इन्हें ब्रिगेडियर के रूप में प्रमोशन देते हुए पैरा ब्रिगेड की कमांड दी गई । बिग्रेडियर के तौर पर पैरा ज्वॉइन करने के बाद उन्होंने पैरा का कोर्स पूरा किया उनका मानना था कि अगर पैरा कमांडो जैसी इलीट फोर्स का विश्वास जीतना है तो पहले उन्हें खुद भी पैरा का कोर्स पूरा करके रेड कैप पहननी होगी इसके लिए उन्होंने मेहनत भी की और पैरा की ट्रेनिंग पूरी करके जता दिया कि उनमें हिम्मत की कोई कमी नहीं है

गोवा मुक्ति अभियान में सगत सिंह की भूमिका
औपनिवेशिक काल से गोवा पर पुर्तगालियों का शासन रहा था । आजादी के बाद भारतीय सरकार ने पुर्तगाल से गोवा मुक्त करने को कहा पर पुर्तगाल सरकार ने साफ़ मना कर दिया और वहां आन्दोलन कर रहे भारतीय गोवा मुक्ति क्रांतिकारियों का उत्पीडन शुरू कर दिया तंग आकर भारत सरकार ने गोवा में पुर्तगालियों के विरूद्ध सैन्य कार्यवाई का निर्णय लिया ।
50 पैराशूट ब्रिगेड ने सगत सिंह के नेतृत्व में इसमें बड़ी भूमिका निभाई सगत सिंह ने इस अभियान का की रणनीति बनाकर इस पर अमल करने के लिए वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को तैयार कर लिया
भारतीय सेना ने चारो ओर से जल ,थल एवं वायु सेना की उस समय की आधुनिकतम तैयारियों के साथ दिसम्बर 17-18 की रात में ऑपरेशन विजय के अंतर्गत सैनिक कार्यवाई शुरू कर दी ऑपरेशन विजय 40 घंटे का था । भारतीय सेना के इस 40 घंटे के युद्ध ने गोवा पर 450 साल से चले आ रहे पुर्तगाली शासन का अंत किया और गोवा भारतीय गणतंत्र का एक अंग बना । इस युद्ध का परिणाम सबको अपेक्षित था मगर भारतीय सेना की तेजी ने सभी को चौका दिया और इस सफल रणनीति का श्रेय सगत सिंह को जाता है।

 

फाइल फोटो- अपने साथी फौजी अधिकारियों के साथ लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह

 

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सगत सिंह के निर्णय ने तोड़ा चीन का अजेय होने का भ्रम

वर्ष 1965 में सगत सिंह को मेजर जनरल के रूप में नियुक्ति देकर 17 माउंटेन डिविजन की कमांड देकर चीन की चुनौती का सामना करने के लिए सिक्किम में तैनात किया गया । वहां चीन ने नाथू ला में लाउड स्पीकर लगाकर भारतीय सेना को चेतावनी दी मगर सगत सिंह ने अविचलित होकर अपना काम जारी रखा,उन्होंने चीनी सैनिको को उन्ही की भाषा में जवाब दिया और सीमा निर्धारण कर तारबंदी का काम जारी रखा जिसे रोकने की चीन ने पूरी कोशिश की और यहाँ चीन और भारतीय सैनिको में संघर्ष हुआ जिसमे भारत के 265 और चीन के 300 से ज्यादा सैनिक हताहत हुए । चीन ने हमले का आरोप भारत पर लगाया। सगत सिंह द्वारा नाथू ला को ख़ाली न करने का निर्णय आज भी देश के काम आ रहा है और नाथू ला आज भी भारत के कब्जे में है,अन्यथा चीन इस पर कब्ज़ा कर लेता। वर्ष 1967 में सगत सिंह को जनरल सैम मानेकशा ने मिजोरम में अलगाववादियों से निपटने की जिम्मेदारी दी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में सगत सिंह की भूमिका
वर्ष 1970 में सगत सिंह राठौर को लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर प्रोन्नति दी गई और 4 कॉर्प्स के कमांडर के रूप में तेजपुर में नियुक्ति दी गई । यह नियुक्ति भी सैम मानेकशा के कारण दी गई क्योंकि सैम सगत सिंह की काबिलियत को बखूबी पहचानते थे लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह के नेतृत्व में 4 कॉर्प्स ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में जबर्दस्त भूमिका निभाई। उस समय ईस्ट पाकिस्तान(बांग्लादेश) में आजादी का आन्दोलन चल रहा था और पाकिस्तान सेना वहां जबर्दस्त नरसंहार कर रही थी जिससे लाखो बंगलादेशी शरणार्थी भारत आ रहे थे जिनसे भारत पर बड़ा संकट आ रहा था,बार बार संयुक्त राष्ट्र में गुहार लगाने और पाकिस्तान को समझाने के बाद भी जब पाकिस्तान बाज नहीं आया तो भारत ने पूरी तैय्यारी के साथ ईस्ट पाकिस्तान में सैन्य कार्यवाही कर बांग्लादेश को आजाद कराने का निर्णय लिया.
बांग्लादेश मुक्ति अभियान में लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के नेतृत्व में सगत सिंह  , टी एन रैना, जे एस गिल ने बेहतरीन रणनीति से पाकिस्तान सेना के छक्के छुड़ा दिए। कई गहरी नदियों को पार करते हुए भारतीय सेना एक के बाद एक शहर जीतती चली गयी। उनके मेधना नदी को हेलीकॉप्टर से पार करके सैनिकों को तत्कालीन पाकिस्तान की जमीन पर उतारने के निर्णय की वजह से बाद 1971 के युद्ध में भारतीय सेना को बहुत बड़ा फायदा पहुंचाया जब दिल्ली में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी,रक्षा मंत्री बाबु जगजीवन राम,रक्षा सचिव बी बी लाल ने यह सुना कि सगत सिंह राठौर ने मेघना नदी पार कर ली है तो किसी को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ और जब विश्वास हुआ तो सब ख़ुशी से झूम उठे.
इसके बाद ही पाकिस्तानी सेना के हौसले टूट गए और यहाँ तक टूट गए कि जब भारतीय सेना ने ढाका को घेर लिया तो वहां 93000 पाकिस्तान सेना थी और भारतीय सैनिकों की संख्या मात्र तीन हजार थी, 16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तान के जनरल नियाजी ने 93000 सैनिको के साथ भारतीय लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया,और बांग्लादेश आजाद हो गया।
 कामयाब सेनानायक होने के बावजूद जानबूझकर उनकी उपलब्धियों की उपेक्षा

बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और सबसे कामयाब कमांडर सगत सिंह  को बांग्लादेश सरकार ने भी मान्यता दी और उन्हें सम्मान दिया गया,
भारत सरकार ने उन्हें पदमभूषण पुरूस्कार दिया जो सिविलियन को दिया जाता है,
यहाँ बहुत आश्चर्यजनक बात ये हुई कि किसी अनजानी वजह से उन्हें गैलेंट्री अवार्ड नही दिया गया जो सैन्य अभियानों को दिया जाता है,इसी को भांपते हुए राजनैतिक नेतृत्व ने उन्हें सिविलियन अवार्ड दिया
कितना दुर्भाग्य की बात है कि उनसे कम सफल सैन्य अधिकारी पुरुस्कृत हुए और इस युद्ध की सफलता के हीरो बन गए ।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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