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80 के दशक में भारत-चीन की अर्थव्यवस्था थीं एक समान

फिर क्यों पिछड़ा भारत किसकी जिम्मेदारी

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मुखिया मुख सों चाहिए, खान पान को एक।

पालै पोसै सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।

गोस्वामी तुलसीदास कहते है जैसे मुह खाने-पीने का काम करता है और शरीर के सभी अंगो का पालन -पोषण करता है | उसी प्रकार में मुखिया (प्रधानमंत्री)  को भी विवेकवान होना चाहिए वह ऐसे काम करें की उसके परिवार का पालन-पोषण भी अच्छे हो जाए ।

प्रधान मंत्री मोदी जी द्वारा घोषित बीस लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज और पिछले पांच दिनों में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन द्वारा उस पैकेज के विभिन्न आयामों की घोषणा स्वतंत्र भारत के आर्थिक इतिहास में मील का पत्थर होने साबित की क्षमता रखता है।

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क्या बात है कि 1980 तक चीन और भारत जो कि अर्थव्यवस्था के आधार पर बराबर थे उसकी अर्थव्यवस्था आज भारत से पाँच गुनी बड़ी है और चीन आर्थिक महाशक्ति बन कर उभर चुका है ,  हमारा देश भारत कहीं  दूर पीछे छूट गया। इसकी वजह पर गौर करें तो सिर्फ एक कारण नजर आता है , हमारी पूर्व की सरकारों की ग़लत आर्थिक नीतियां । क्या कारण है कि 1960 और 70 के दशक में बने क़ानून जो कि तब की स्थिति से निपटने के लिए थे उन्हें आज तक ढोया जा रहा जबकि देश का आर्थिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल चुका है। अगर हम पिछले पांच दिनों में वित्तमंत्री द्वारा की गई घोषणाओं को देखे तो हमें कुछ बातें साफ़ समझ आती हैं।

 

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  • पैकेज की घोषणा में लौकडाउन की वजह से हाशिये पर आए लोगों एवं प्रवासी मज़दूरों का विशेष ध्यान रखा गया है। उनके लिए अलग-अलग मदों में डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर  के माध्यम से खातों में पैसा, जन वितरण प्रणाली द्वारा मुफ़्त अनाज तथा अन्य प्रयोजन हैं।

 

  • सरकार ने संकट को अवसर में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और सारा बल आर्थिक सुधारों पर है। अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों द्वारा सरकार के निर्णयों का समर्थन इस बात की पुष्टि करता है। अगर ये आर्थिक सुधार क्रियान्वित्त हो गए और जैसा कि लगता है हो जाने चाहिए तो भारत के आर्थिक विकास दर को नयी गति मिलेगी।

 

  • यह पैकेज उन लोगों के लिए निश्चय की निराशा का कारण है जिन्होंने ये सोचा था की सरकार दबाव में आ कर आनन-फ़ानन में पैसे ख़र्च करने लगेगी और उन्हें बंदरबाँट करने का भरपूर मौक़ा मिलेगा । सरकार ने बड़ी ज़िम्मेदारी के साथ विभिन्न पहलुओं का समायोजन किया है और यह भी ध्यान रखा है कि वित्तीय घाटा कहीं नियंत्रण से बाहर ना हो जाए क्यूँकि अगर ऐसा होता है तो इसकी क़ीमत भी देश को और ख़ास कर गरीब तबकों को चुकानी पड़ती है।

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