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भारत के खिलाफ क्यों होते हैं भारतीय वामपंथी पत्रकार ?

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नई दिल्ली- जब भारत पूरी तन्मयता से कोरोना से लड़ रहा है , भारतीय मीडिया का एक हिस्सा भारत के खिलाफ लड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अपने सम्बंधों का फायदा उठाकर कुछ कथित भारतीय नामों वाले पत्रकार भारत के खिलाफ प्रोपेगैंडा फैलाने में शामिल हैं। इन मीडिया हाउस और पत्रकारों की जमात ने एक परिपाटी बना ली है कि कहीं भी भारत के खिलाफ कुछ भी छपे अपने यहां प्रमुखता देना इनका मुख्य शगल बन चुका है फिर इस पर डिबेट खड़ी करना और भारत की सरकार को नीचा दिखाना इनका प्रमुख उद्देश्य बना चुका है ।

कोरोना के खिलाफ भारत जब एक सफल लड़ाई लड़ रहा है तब इन मीडिया हाउसेज और वेव पोर्टल्स ने भारत की क्षमताओं पर सवाल उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अपने लेखों में भारत को कोरोना के खिलाफ लड़ाई में असफल साबित भी कर दिया था । जब देश में कोरोना के केस आबादी के हिसाब से कम निकलने लगे तो उन्होंने कोरोना टेस्टिंग पर सवाल खड़े कर दिए और कहा जाने लगा कि भारत में पर्याप्त टेस्टिंग नहीं हो रही है। भारत में कोरोना ब्लास्ट के लिए जिम्मेदार रही तबलीगी जमात को इन्होंने खूब बचाव किया और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी द्वारा अरब देशों से भारत सरकार के खिलाफ ट्वीट वॉर में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अरब देशों से भारत के अच्छे सम्बंधों को खराब करने की कोशिश की गई । भारत के खिलाफ विदेशी अखबारों में लेख लिखे गए । इनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ भारत की छवि को खराब करना रहा है। आईसीएमआर द्वारा दिए गए आंकड़ो को मीडिया हाउसेज में शंका की दृष्टि से देखा गया। अब नया शिगूफा छोड़ा गया है कि जब देश में कुछ ही केस थे तब तो लॉकडाउन कर दिया गया आज जब देश में लाखों केस हैं तो फिर धीरे धीरे लॉकडाउन के फेज को खत्म क्यों किया जा रहा है । इनके सवाल देश के विरोध में ही होते हैं ।

इनके चरित्र पर संदेह क्यों होता है ?

अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जब कोरोना को चीनी वायरस कहा था तो इन वामपंथी पत्रकारों के छाती पर सांप लोट गया था ये पूरी ताकत से ट्रम्प के बयान को खारिज करने में जुट गए थे । इन्होंने दलील देने शुरू कर दिए थे कि किसी भी बीमारी को जगह के नाम से सम्बोधित नहीं करना चाहिए । इनकी वैचारिकी पर चीन का नाम आने से पर्दा पड़ जाता है । जबकि बहुत पुरानी परिपाटी है जिस जगह से जो भी बीमारी शुरू हुई है उसे उसी नाम से जाना गया है । जैसे जर्मन मीजल्स , जापानी इंसेफ्लाइटस , मर्स यहा तक की जब भारत में एक एंटीबायोटिक-रेसिस्टेंट बैक्टीरियल स्ट्रेन मिला तो उसे न्यू डेल्ही मेटलो बीटा-लैक्टामेस-1 यानी एनडीएम-1 नाम दिया गया । पुरानी परिपाटी के विरोध में तर्क देकर इन्होंने अपनी विश्वनीयता को कुंए में धकेल दिया है ।

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पत्रकार कम षणयंत्रकारी ज्यादा लगने लगे हैं

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वामपंथी पत्रकारों की विश्वनीयता पहले की गर्त में है और ये खुद भारत विरोधी प्रोपेगैंडा चला कर अपनी विश्वनीयता को और तली में धकेल रहे हैं । भारत सरकार की छवि खराब करने के साथ-साथ ये राष्ट्रवादी पत्रकारों पत्रकारिता की छवि को नुकसान पंहुचाने की भी कोशिश लगातार कर रहे हैं।

इलाज क्या है ?

पूरे विश्व में वामपंथी पत्रकार अपनी छवि को खुद ही नुकसान पंहुचा रहे हैं। लोकतंत्रिक देशों में बोलने की आजादी का फायदा उठा कर उन्हीं देशों के खिलाफ मुहिम चलाना इनका प्रिय शगल है इन सब कृत्यों के लिए ये विदेशी एंजेसीज से पैसा भी पाते हैं। ये कभी उन देशों के खिलाफ मुहिम नहीं चलाते जिन देशों में लोकतंत्र नहीं है । चीन जैसे देश इनके हमेशा से प्रिय रहे हैं वहां इनको सब ठीक नजर आता है । भारत जैसे देशों में ये चीन के माउथपीस हैं। इसलिए लोकंतांत्रिक देशों को फिलहाल के लिए जनअधिकारों में कुछ कटौती की आवश्यकता है ताकि इन्हें नियंत्रित किया जा सके । ताकि ये अधिकारों के नाम पर अपनी गंदी मुहिम न चला सके ।

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