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हिंदु साम्राज्य दिवस – शिवाजी की वीरता को याद करता है हिंदुस्तान

शिवाजी की याद में मनाया जाता है हिंदु साम्राज्य दिवस , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ करता है याद

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नई दिल्ली- आज हिंदु साम्राज्य दिवस है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक अपनी शाखाओं पर मकर संक्रांति, वर्ष प्रतिपदा, हिंदू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा, रक्षा बंधन एवं विजयादशमी को उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसी में से एक हिंदू साम्राज्य दिवस, ज्येष्ठ शुक्ल त्र्योदशी को मनाते हैं। उस दिन शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था। 17 वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक की वर्षगांठ को हिंदू साम्राज्य दिवस या शिवराज्याभिषेक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को ऐतिहासिक तौर पर महान मराठा साम्राज्य के शासक शिवाजी के राज्याभिषेक के उत्सव के तौर पर देखा जाता है जिन्होंने मुगल और अन्य कई साम्राज्यों को चुनौती देते हुए एक हिंदू राज्य अस्तित्व में लाया था। छत्रपति शिवाजी 17 वीं शताब्दी के शासक थे जिन्होंने मराठा साम्राज्य की स्थापना की थी। इस दौरान उन्होंने मुगल शासक ओरंगजेब से प्रताड़ित हिंदु समाज को संरक्षण प्रदान किया था। उनके शासनकाल में मराठा साम्राज्य की स्थिति लगातार मजबूत होती गई ।

एक अद्भुत योद्धा शिवाजी

 

शिवाजी का जन्म 1627 ई. में पुणे के शिवनेरी किले में हुआ था और इसका नाम देवी शिवाई के नाम पर रखा गया था। 6 जून, 1674 को ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, छत्रपति शिवाजी को हिंदू साम्राज्य के शासक के रूप में ताज पहनाया गया था। हालांकि, रायगढ़ में लोग हिंदू माह ज्येष्ठ के शुक्ल त्रयोदशी (13वें दिन) को मनाते हैं, जो 4 जून को पड़ता है। मराठा इतिहास से शिवाजी की बहादुरी की कहानियां हैं जो उन्हें एक महान योद्धा के रूप में याद करती हैं। शिवाजी के पिता शाहजी और माता जीजाबाई थी। राष्ट्र को विदेशी और आतताई राज्य-सत्ता से स्वाधीन करा सारे भारत में एक सार्वभौम स्वतंत्र शासन स्थापित करने का एक प्रयत्न स्वतंत्रता के अनन्य पुजारी वीर प्रवर शिवाजी महाराज ने भी किया था। इसी प्रकार उन्हें एक अग्रगण्य वीर एवं अमर स्वतंत्रता-सेनानी स्वीकार किया जाता है।

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सभी के लिए भयमुक्त शासन की स्थापना 

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1674 की ग्रीष्म ऋतु में शिवाजी ने धूमधाम से सिंहासन पर बैठकर स्वतंत्र प्रभुसत्ता की नींव रखी। दबी-कुचली हिन्दू जनता को उन्होंने भयमुक्त किया। हालांकि ईसाई और मुस्लिम शासक बल प्रयोग के जरिए बहुसंख्य जनता पर अपना मत थोपते, अतिरिक्त कर लेते थे, जबकि शिवाजी के शासन में इन दोनों संप्रदायों के आराधना स्थलों की रक्षा ही नहीं की गई बल्कि धर्मान्तरित हो चुके मुसलमानों और ईसाईयों के लिए भयमुक्त माहौल भी तैयार किया। शिवाजी ने अपने आठ मंत्रियों की परिषद के जरिए उन्होंने छह वर्ष तक शासन किया। उनकी प्रशासनिक सेवा में कई मुसलमान भी शामिल थे।
जब धोखे से शिवाजी को मारने की कोशिश की गई
 शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित बीजापुर के शासक आदिलशाह जब शिवाजी को बंदी न बना सके तो उन्होंने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार किया। पता चलने पर शिवाजी आगबबूला हो गए। उन्होंने नीति और साहस का सहारा लेकर छापामारी कर जल्द ही अपने पिता को इस कैद से आजाद कराया। तब बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जीवित अथवा मुर्दा पकड़ लाने का आदेश देकर अपने मक्कार सेनापति अफजल खां को भेजा। उसने भाईचारे व सुलह का झूठा नाटक रचकर शिवाजी को अपनी बांहों के घेरे में लेकर मारना चाहा, पर समझदार शिवाजी के हाथ में छिपे बघनखे का शिकार होकर वह स्वयं मारा गया। इससे उसकी सेनाएं अपने सेनापति को मरा पाकर वहां से दुम दबाकर भाग गईं।
 मुगलों को दी शिवाजी ने टक्कर

 

 शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से चिंतित हो कर मुगल बादशाह औरंगजेब ने दक्षिण में नियुक्त अपने सूबेदार को उन पर चढ़ाई करने का आदेश दिया। लेकिन सुबेदार को मुंह की खानी पड़ी। शिवाजी से लड़ाई के दौरान उसने अपना पुत्र खो दिया और खुद उसकी अंगुलियां कट गई। उसे मैदान छोड़कर भागना पड़ा। इस घटना के बाद औरंगजेब ने अपने सबसे प्रभावशाली सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में लगभग 1,00,000 सैनिकों की फौज भेजी। शिवाजी को कुचलने के लिए राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान से संधि कर पुरन्दर के क़िले को अधिकार में करने की अपने योजना के प्रथम चरण में 24 अप्रैल, 1665 ई. को ‘व्रजगढ़’ के किले पर अधिकार कर लिया। पुरन्दर के किले की रक्षा करते हुए शिवाजी का अत्यन्त वीर सेनानायक ‘मुरार जी बाजी’ मारा गया। पुरन्दर के क़िले को बचा पाने में अपने को असमर्थ जानकर शिवाजी ने महाराजा जयसिंह से संधि की पेशकश की। दोनों नेता संधि की शर्तों पर सहमत हो गए और 22 जून, 1665 ई. को ‘पुरन्दर की सन्धि’ सम्पन्न हुई।

 

छापामार युद्धनीति के जनक 

 

कहते हैं कि छत्रपति शिवाजी ने ही भारत में पहली बार गुरिल्ला युद्ध का आरम्भ किया था। उनकी इस युद्ध नीती से प्रेरित होकर ही वियतनामियों ने अमेरिका से जंगल जीत ली थी। इस युद्ध का उल्लेख उस काल में रचित ‘शिव सूत्र’ में मिलता है। गोरिल्ला युद्ध एक प्रकार का छापामार युद्ध। मोटे तौर पर छापामार युद्ध अर्धसैनिकों की टुकड़ियों अथवा अनियमित सैनिकों द्वारा शत्रुसेना के पीछे या पार्श्व में आक्रमण करके लड़े जाते हैं।
तुलजा भवानी के उपासक शिवाजी 

 

महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले में स्थित है तुलजापुर। एक ऐसा स्थान जहां छत्रपति शिवाजी की कुलदेवी मां तुलजा भवानी स्थापित हैं, जो आज भी महाराष्ट्र व अन्य राज्यों के कई निवासियों की कुलदेवी के रूप में प्रचलित हैं। वीर छत्रपति शिवाजी महाराज की कुलदेवी मां हैं ऐसा कहा जाता तुलजा भवानी ने उनकी आराधना से खुश होकर उन्हें तलवार भेंट की थी जो अभी लंदन के एक म्यूजियम में रखी हुई है ।

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