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‘वंदे मातरम’ जिसने स्वदेशी की अलख जगाकर अंग्रेजों को घुटनों पर ला दिया था

भारत में फिलहाल चाइनीच सामान के बहिष्कार की मुहिम चल रही है। ये आर्टिकल उन लोगों के लिए जवाब है जो इस मुहिम को कमजोर करना चाहते हैं। जानिए कैसे एक गीत ने उस ब्रितानिया को घुटनों पर ला दिया था जिसका सूरज कभी अस्त नहीं होता था

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नई दिल्ली- बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1882 में आनन्द मठ लिखा था जिससे हमारे राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लिया गया है। स्वदेशी के आंदोलन में और अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की मुहिम में वंदे मातरम का अविस्मरणीय योगदान रहा था। भारतीयों के दिल और दिमाग में जल रही आजादी की लौ को इस गीत ने आग बना दिया जिससे अंग्रेजों के पैर उखड़ने लगे थे ।

आनन्द मठ जब लोगों ने धीरे धीरे पढ़ना शुरु किया तो वंदे मातरम लोगों कि जुबान पर उभर कर आया । जैसै जैसे वंदे मातरम का अर्थ स्पष्ट होने लगा तब लोगो में खासकर युवा वर्गों में काफी उत्साह देखने को मिला । आनन्द मठ उपन्यास बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा अंग्रेजी सरकार और उन राजाओं के विरोध में लिखा जो किसी भी समुदाय के हो लेकिन अंग्रेजी सरकार को सहयोग करते थे । उपन्यास को लिखते हुए उन्होने बगावत की भूमिका लिखी कि अब बगावत होनी चाहिए ताकि उस अंग्रेजी सत्ता को हम पलट सकें और इस तरह वन्दे मातरम देश गान बनना चाहिए यही उनका संदेश था।

जब वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चटर्जी लिख रहे थे तो उनकी बेटी ने उनसे सवाल किया कि वंदे मातरम के शब्द को काफी कठिन हैं । लोगों को इन शब्दों को बोलने और समझने में काफी परेशानी की सामना करना पड़ेगा। इसलिए आप इसे सरल बनाइये , ताकि हर किसी जुबान पर आसानी से चढ़ जाए तब उन्होंने अपनी बेटी को बोला ‘आज तुम्हे यह गीत भले ही कठिन लग रहा हो परन्तु आने वाले दिनों में यह यह हर क्रांतिवीर नौजवानों के लिए प्रेरणा बनेगा।‘  इस कथन के ठीक 12 साल बाद बंकिम जी का देहांत हो गया।  इसके बाद उनकी बेटी और परिवारीजनों ने आनंद मठ का बड़े स्तर पर प्रचार प्रसार करवाया।  आनन्द मठ अनेकों भारतीय भाषाओँ में छपी।  विभिन्न भाषा बोलने वाले युवाओं तक जब आनन्द मठ की अनुवादित प्रतियां पहुंची तो युवाओं ने इसे हाथों हाथ लिया । युवाओं को संदेश देनी वाली, अत्यंत जोश भरने वाली तथा अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बिगुल फूंकने इस पुस्तक को युवाओं ने खूब सराहा । जब अंग्रेजी सत्ता को इस साहित्य के बारे में पता तो अंग्रेजी सरकार ने इस पर पाबन्दी लगा दी , पुस्तक को भी जलाया गया लेकिन मूल प्रति बची रहने के कारण इसका प्रसार निरंतर होता गया ।

इस पुस्तक की महत्ता तब सामने आई जब अंग्रेज अधिकारी कर्जन ने 1905 में बंगाल को दो हिस्सों में बाँट दिया। पूर्वी और पश्चिमी बंगाल। पूर्वी बंगाल जो मुसलमानो के लिए था और पश्चिमी हिन्दुओं के लिए।  यह धर्म के आधार किया गया पहला बंटवारा था।  उस समय के तीन बड़े नायक लाला लाजपत राय , बालगंगाधर तिलक , विपिन चंद्रपाल ने इस बंटवारे को पुरजोर विरोध किया।  लोगों से अपील किये की लोग अंग्रेजी सरकार तथा उसके द्वारा उत्पादन किये गए वस्तुओं का विरोध करे।

लोगों से कहा गया अंग्रेजी कपड़ा पहनना बंद करो , करोड़ों भारतीय ने अंग्रेजी कपड़ा पहनना बंद कर दिया।  फिर उन्होंने कहा अंग्रेजी ब्लेड का इस्तेमाल बंद करो, तो नाइयों ने ब्लेड का इस्तेमाल छोड़ उस्तरा का प्रयोग किया। उन्होंने चीनी के इस्तेमाल को बहिष्कार करवाया जो उस समय इंग्लैंड से बनकर आती थी। इस एक के बाद एक बहिष्कार से अंग्रेजी सत्ता तिलमिला उठी। लगभग छह साल चले आंदोलन से अंग्रेज व्यापार को इतना बड़े पैमाने पर नुकसान पहले कभी नहीं हुआ था।  जब ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चौपट होने लगा था तो उसने सरकार से धंधा दोबारा चलवाने के लिए भारतीय की शर्तों को मानने के लिए कहा और वह शर्त थी जो धर्म के आधार पर बंटवारा किया गया है उसे वापस लो । अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा और 1911 में डिवीज़न ऑफ़ बंगाल एक्ट वापस लिया गया।

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तो उस वक्त यह बातें निकलकर सामने आईं कि अंग्रेजों को झुकाना है तो बहिष्कार ही सबसे बड़ी ताकत है और यह छह साल जो आंदोलन चला उसका मूल मंत्र था ‘वंदे मातरम’

इसके बाद करोड़ो क्रांतिकारियों ने इस मूल मंत्र को अपनाया।  वो हर कार्यकर्म में वंदे मातरम गाते थे , कार्यक्रम की शुरुआत तथा अंत ‘वंदे मातरम’ से होने लगा।

बड़े पैमाने पर विरोध हर गली , हर चौराहे पर वंदे मातरम की गूंज से होने लगी , इसके साथ ही बंगाल की सत्ता कमजोर होती गयी । अंत में सरकार को मजबूर होकर बंगाल छोड़ना पड़ा क्योंकि बंगाल इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था , 1905 में शुरू हुए आंदोलन से घबराकर अंग्रेजों ने  राजधानी कोलकाता से निकाल कर दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला किया । 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित किया।

फिर वंदे मातरम पूरे भारत की आवाज बन गया । हर क्रांतिकारी ने इसे अपनाया । बंकिम चंद्र चटर्जी ने जो अपनी बेटी को बोला था कि ये गीत हर युवा की जुबान पर होगा वो बात सत्य हो गई। आजादी का ये गीत जिसने देश की आजादी को दिशा दी थी। आजादी के बाद भारतीय इसको गाना भूल गए । कुछ राष्ट्रवादी संगठन आज भी अपने कार्यक्रमों की शुरूआत इस गीत से करते हैं । कुछ राजनैतिक पार्टियों ने वोटबैंक की खातिर इस गीत को बिसरा दिया है।

इस आर्टिकल के लेखक इंद्रजीत यादव हैं

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