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कोरोना वायरस से जान बचाने वाली पहली दवा साबित हुई डेक्सामेथासोन

कुछ ऐसे मरीज़ जिन्हें ऑक्सीजन या फिर वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ रही है, यह दवा ऐसे ही अधिक जोखिम वाले मरीज़ों को मदद पहुँचाती है।

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नई दिल्ली- कोविड19 से संक्रमित गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों की जान बचाने में मदद कर सकती है. डेक्सामेथासोन । यह दवा बेहद सस्ती और हर जगह आसानी से उपलब्ध है

विशेषज्ञों का कहना है कि कम मात्रा में इस दवा का उपयोग कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है ।
जिन मरीज़ों को गंभीर रूप से बीमार पड़ने की वजह से वेंटिलेटर का सहारा लेना पड़ रहा है, उनके मरने का जोखिम क़रीब एक तिहाई इस दवा की वजह से कम हो जाता है. जिन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है, उनमें पांचवें हिस्से के बराबर मरने का जोखिम कम हो जाता है.

यह दवा 1960 के दशक से गठिया और अस्थमा के इलाज में इस्तेमाल किया जा रहा है ।कोविड19 से संक्रमित जिन मरीज़ों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ रही है, उनमें से आधे नहीं बच पा रहे हैं इसलिए इस जोखिम को एक तिहाई तक कम कर देना एक बहुत बड़ी कामयाबी है.

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि अगर इस दवा का इस्तेमाल संक्रमण के शुरुआती दौर से ही किया जाता तो पुरी दुनिया में लगभग पंद्रह हजार लोगों की जान बचाई जा सकती थी। बेहद सस्ती होने के कारण यह दवा गरीब मुल्कों के लिए भी काफ़ी फ़ायदेमंद साबित हो सकती है।

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एक अनुमान के मुताबिक कोरोना के क़रीब 20 मरीज़ों में से 19 मरीज़ बिना अस्पताल में भर्ती हुए ठीक हो रहे हैं. कुछ अस्पताल जाकर ठीक हो रहे है, लेकिन कुछ ऐसे मरीज़ हैं जिन्हें ऑक्सीजन या फिर वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ रही है। यह दवा ऐसे ही अधिक जोखिम वाले मरीज़ों को मदद पहुँचाती है।

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इस दवा का उपयोग पहले से ही सूजन को घटाने में किया जाता रहा है और अब यह कोरोना वायरस से लड़ने में शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली को मदद पहुँचाने वाली है। जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अधिक सक्रियता के साथ प्रतिक्रिया करती है ।तब वैसे हालात को साइटोकिन स्टॉर्म कहा जाता है यह जानलेवा हो सकता है।

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ने इस दवा कि अध्ययन के लिए पहले 2000 मरीजों के दल पर इसका इस्तेमाल किया गया इसके तुलनात्मक 4000 मरीजों को दवा नही देकर जांचा जा रहा है ।
वेंटिलेटर के सहारे जो मरीज़ जीवित थे उनमें इस दवा के असर से 40 फ़ीसदी से लेकर 28 फ़ीसदी तक मरने का जोखिम कम हो गया और जिन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत थी उनमें 25 फ़ीसदी से 20 फ़ीसदी तक मरने की संभावना कम हो गई.

इस दवा कि जांच में मुख्य अध्ययनकर्ता प्रोफ़ेसर पीटर हॉर्बी ने कहा, “यह मृत्यु दर कम करने वाली पहली दवा साबित हुई है और यह कमी इतनी है जो कि काफ़ी अहम मात्रा में है. यह एक बड़ी कामयाबी है.”

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