Thejantarmantar
Latest Hindi news , discuss, debate ,dissent

- Advertisement -

262 वर्षों से देश सेवा में है बिहार रेजिमेंट,, बाबू वीर कुँवर सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों को घुटने पर लाए थे

बिहार रेजिमेंट के वीर जवान अपनी जान की परवाह किए बिना देश पर मर मिटना जानते है ऐसा उनके खून में है ।

342

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

- Advertisement -

पटना-भारत चीन के बीच हिंसक झड़प में 16 बिहार रेजिमेंट के अधिकारी कर्नल संतोष बाबू तथा भारतीय जवानों की शहादत की खबर से दानापुर छावनी में मानों थोड़ी देर के लिए मातम पसर गया था। लेकिन बाबू वीर कुँवर सिंह की शौर्य गाथा से पटा रेजिमेंट जल्द अपने

स्लोगन ‘कर्म ही धर्म है’ की ताकत से अपने गम को गर्व में तब्दील करने लगा। कौन, कहां का, कितना, इन सबके बीच आपसी बतकही की यह लाइन ज्यादा मजबूत हो गई कि ‘बिहार रेजिमेंट के वीर जवान अपनी जान की परवाह किए बिना देश पर मर मिटना जानते है ऐसा उनके खून में है ।

कई युद्धों में अहम भूमिका निभाई है ।

वर्ष 1944 में जापानी सेना के आक्रमण का सामना करने के लिए भारत के पूर्वी तट पर 1 बिहार रेजिमेंट को लुशाई ब्रिगेड में शामिल कर इम्फाल भेजा गया। सैनिकों ने अजेय हौसले का परिचय देते हुए हाका और गैंगा पहाड़ियों को जापानी सैनिकों के कब्जे से मुक्त कराया। आज भी इसकी याद में दानापुर स्थित बिहार रेजिमेंटल सेंटर में हाका और गैंगा द्वार बना हुआ है।1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में रेजीमेंट के सैनिकों की शौर्य गाथा का परचम आज भी फहरा रहा है ।
कारगिल युद्ध के दौरान बिहार रेजीमेंट की पहली बटालियन ने अजेय हौसले और हिम्मत का परिचय देते हुये अगम्य परिस्थितियों में बटालिक सेक्टर में दुश्मनों के कब्जे से पोस्टों को मुक्त कराया। प्वाइंट 4268 और जुबेर ओपी पर पुनः कब्जा जमाया। युद्ध के दौरान प्रथम बिहार के एक अधिकारी और आठ जवान शहीद हुए। प्रथम बिहार को बैटल ऑनर बटालिक तथा थिएटर ऑनर कारगिल का सम्मान दिया गया।

बिहार रेजिमेंट को मिले पदक

- Advertisement -

मिलिट्री क्रॉस (स्वतंत्रता पूर्व) – 6, अशोक चक्र 3, महावीर चक्र – 2, कीर्ति चक्र – 13, वीर चक्र – 15, शौर्य चक्र – 45

- Advertisement -

1758 से शुरू है बिहार रेजिमेंट की वीर गाथा

बिहार रेजिमेंट के योद्धाओं की वीरगाथा 1758 में ही शुरू हुई थी। अप्रैल 1758 में तीसरी बटालियन की पटना में हुयी स्थापना के बाद से बिहार के जवानों ने अपनी वीरता की कहानी लिखनी शुरू कर दी थी। कैप्टन टर्नर इस बटालियन की कमान संभालने वाले पहले अधिकारी थे। अंग्रेजों के कब्जे के बाद जून 1763 में मीर कासिम ने पटना पर धावा बोल दिया।

बिहारी रेजिमेंट की तीसरी बटालियन के कुछ सैनिकों ने मीर कासिम की विशाल सेना को पीछे धकेल दिया। अंग्रेजी सेना द्वारा मदद नहीं मिलने के चलते मीर कासिम की सेना विजयी रही। अंग्रेजों की तीन बटालियन समाप्त हो गयी। बंगाल, बिहार और ओड़िसा पर पुनः राज्य स्थापित करने के लिए बिहारी सैनिकों को लेकर अंग्रेजों ने 6 ठी, 8 वीं और 9 वीं बटालियन बनाई। इन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले की कई लड़ाइयों में अपनी वीरता का लोहा मनवाया।

बाबू कुंवर सिंह नेतृत्व में बिहार रेजिमेंट

बाबू वीर कुँवर सिंह
बाबू वीर कुँवर सिंह

जुलाई 1857 में दानापुर स्थित 7वीं और 8 वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल फूंकते हुए अंग्रेजों पर गोलियां बरसायीं। अस्त्र शस्त्र और ध्वज लेकर सैनिकों ने जगदीशपुर चले आये और बाबू कुंवर सिंह के साथ शामिल हो गए। इन सैनिकों के साथ मिलकर बाबू कुंवर सिंह ने आरा पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों की सेना को शिकस्त दे आरा पर कब्जा कर लिया।

इस हार से अंग्रेजों के भीतर एक डर पैदा हुआ । हालांकि लडाई के काऱण लगी गोलियों के घाव से बाबू कुंवर सिंह की मृत्यु हो गयी। बिहारी सैनिकों के साहस से अंग्रेज इतने डर गए की 12 को छोड़ कर सभी यूनिटें भंग कर दी। 1941 तक अंग्रेज बिहारी सैनिकों को लेकर एक भी बटालियन बनाने की हिम्मत नहीं जुटा सके थे।

- Advertisement -

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More