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एक गांव जिसमें आजादी से लेकर अब तक नहीं हुए सरपंच के चुनाव

आजादी के बाद से निर्विरोध सरपंच चुनना गांव की है परम्परा

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फरीदाबाद– भारत के ऐसा देश जिसमें चुनाव एक अनिवार्य प्रक्रिया है। चुनावों के माध्यम से जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं। लेकिन जब हम आपको ऐसा गांव बताएंगे कि आज तक किसी भी सरपंच को चुनावों के माध्यम से नहीं चुना गया है। जी हां गांव वाले मिल बैठ कर तय करते हैं कि कौन पांच साल के लिए सरपंच बनेगा इस निर्णय को गांव हरेक व्यक्ति मानता है।

हरियाणा के फरीदाबाद जिले में गांव पड़ता है प्रह्लादपुर मंजरा बदरौला , गुर्जर बाहुल्य इस गांव में आजादी से लेकर अभी सभी सरपंच निर्विरोध चुने गए है , प्रह्लादपुर मंजरा बदरौला की दो हजार की आबादी है। ये गांव के लिए नजीर है जिसमें प्रधानी और सरपंच के चुनाव के लिए लाखों खर्च होते हैं , शराब से लोगों की जिंदगी खराब की जाती है। जब इस दौर में चुनाव जीतना लोगों की प्राथमिकता में शामिल है तब ये गांव देश के दूसरे गावों के लिए उदाहरण बन रहा है कि कैसे गांव में चुनावों में अगर प्रधान या सरपंच को निर्विरोध चुन लिया जाए तो गांव के लाखों रुपए के बचत हो सकती है और युवाओं को चुनावों के दुष्प्रभाव ( शराब इत्यादि ) से बचाया जा सकता है।

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प्रह्लादपुर के निवासी संतराम कहते हैं कि हमारे बुजुर्गों ने जो परम्परा डाली है युवा भी उसको आगे बढ़ा रहे हैं। कई बार गांव में चुनाव होने तक की नौबत भी आ गई है । लेकिन गांव के लोगों ने जिसको निर्विरोध चुनने का फैसला किया है अंत तक उसके पक्ष में गांव वाले डटे रहे हैं जिसकी वजह से जिद्द से चुनाव लड़ने की कोशिश करने वाले लोगों ने अपने पैर पीछे खींच लिए हैं। चुनाव नहीं होने की वजह से गांव में वैमनस्य भी नहीं है और गांव में लड़ाई झगड़े भी चुनावों को लेकर नहीं होते हैं । संतराम कहते हैं हमारे समझदार बुजुर्गों की इस परम्परा से गांव सुख शांति हैं।

संतराम कहते हैं कि गांव के लोग हरियाणवी कल्चर और फॉक को भी बढ़ावा दे रहे हैं गायक ज्ञानेंद्र सरधना यूट्यूब पर खासे लोकप्रिय है वहीं रोहित सरधना रागिनी लेखक हैं। गांव के दो लड़के एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं और दो राष्ट्रीयकृत बैंकों में मैनेजर की पोस्ट पर जॉब कर रहे हैं। गांव के अधिकांश लोग खेतीबाडी करते हैं और दूध का व्यवसाय करते हैं । गांव में लोग मांस मंदिरा का सेवन बिल्कुल नहीं करते हैं। प्रह्लादपुर मंजरा बदरौला आप-पास के गांव के साथ साथ देश भर के गांवों के लिए नजीर है कि कैसे गांव को नाजायज खर्चों के बचा कर विकसित करने की सोच बनाई जा सकती है।

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