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फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ- पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाले जनरल

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नई दिल्ली- 29 अप्रैल, 1971 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाई। बैठक में एक खास आदमी भी शामिल हुआ सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ । इंदिरा गांधी ने तत्कालीन बंगाल के मुख्यमंत्री के रिपोर्ट सैम मानेकशॉ की तरफ फेंकी बोली , मुझे पाकिस्तान पर हमला चाहिए अभी। मानेकशॉ ने हमला करने किए इंदिरा गांधी को साफ साफ मना कर दिया ।  बैठक शामिल तत्कालीन वित्तमंत्री यशवंत च्वहाण ने तंज कसते हुए कहा कि तुम डर गए हो जनरल । मानेनशॉ ने जवाब दिया  ‘मैं एक फौजी हूं। बात डरने की नहीं समझदारी और फौज की तैयारी की है। इस समय हम लोग तैयार नहीं हैं। आप फिर भी चाहती हैं तो हम लड़ लेंगे पर मैं गारंटी देता हूं कि हम हार जायेंगे। हम अप्रैल के महीने में हैं। पश्चिम सेक्टर में बर्फ पिघलने लग गयी है। हिमालय के दर्रे खुलने वाले हैं, क्या होगा अगर चीन ने पाकिस्तान का साथ देते हुए वहां से हमला कर दिया? कुछ दिनों में पूर्वी पाकिस्तान में मॉनसून आ जाएगा, गंगा को पार पाने में ही मुश्किल होगी। ऐसे में मेरे पास सिर्फ सड़क के जरिए वहां तक पहुंच पाने का रास्ता बचेगा। आप चाहती हैं कि मैं 30 टैंक और दो बख्तरबंद डिवीज़न लेकर हमला बोल दू!’ मानेकशॉ के तर्कपूर्ण बातों से इंदिरा गांधी संतुष्ट थीं और उन्हें अपने हिसाब से तैयारी करने की छूट दी गई ।

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ

उसके बाद इतिहास हैं कि कैसै भारत ने दुनिया के नक्शे पर एक नए देश को जन्म दिया । 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के औपचारिक आत्मसमर्पण के बाद भारत को इस युद्ध में जीत मिल चुकी थी.। और इस तरह एशिया में एक नए मुल्क का उदय हुआ। बांग्लादेश का निर्माण होना भारत और वहां के नागरिकों की संयुक्त सफलता थी, लेकिन अगर हम इस युद्ध में भारत की अपनी एक अहम उपलब्धि की बात करें तो वह थी पाकिस्तान का हमारी शर्तों पर आत्मसमर्पण करना। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाज़ी को सरेआम ढाका में आत्समर्पण करवाया था।

उनका पूरा नाम सैम होरमूज़जी फ़्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ था ।सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ। उनका परिवार गुजरात के शहर वलसाड से पंजाब आ गया था। मानेकशॉ ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में की। बाद में वे नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए। वे देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने गए 40 छात्रों में एक थे।

सैम मानेकशॉ के बहुत किस्से मशहूर हैं

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उनके दोस्त, उनकी पत्नी, उनके नाती, उनके अफ़सर या उनके मातहत या तो उन्हें सैम कह कर पुकारते थे या “सैम बहादुर”। सैम को सबसे पहले शोहरत मिली साल 1942 में। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बर्मा के मोर्चे पर एक जापानी सैनिक ने अपनी मशीनगन की सात गोलियां उनकी आंतों, जिगर और गुर्दों में उतार दीं। फौज के अधिकारी ने आदेश दिया कि बर्मा के मोर्चे से फौज पीछे हटने की तैयारी करे। जो घायल है उनको वहीं छोड़ दिया जाए । लेकिन उनके साथी हवलदार शेरसिंह उनको कंधे पर उठाकर ले आए और उनको डॉक्टरों को दिखाया गया । डॉक्टर उनका इलाज नहीं करना चाहते थे तो नाराज शेरसिंह ने डॉक्टर पर अपनी रायफल तानते हुए उनका इलाज करवाया । सात गोलियां लगने के बाद भी सैम मानेकशॉ आश्चर्यजनक रूप से बच गए।

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ
जवानों के साथ फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ

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साजिश के तहत फंसाने की कोशिश भी हुए सैम को

1960 के दशक की शुरुआत में उनके खिलाफ कोर्ट ऑफ इंक्वायरी का आदेश दिया गया था, जब वह वेलिंगटन में डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कालेज के कमांडेंट के रूप में कार्यरत थे। इसके सटीक कारणों को कभी स्पष्ट नहीं किया गया क्योंकि मानेकशॉ ने इसके बारे में बोलने से हमेश बचते रहे । पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल जे.एफ.आर. जैकब ने अपनी पुस्तक ‘एन ओडिसी इन वॉर एंड पीस’ में लिखा है कि ‘उनके खिलाफ अभियान में प्रमुख रूप से मानेकशॉ, रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन और उनके समर्थक लेफ्टिनेंट जनरल (बी.एम. कौल) शामिल थे। कौल को नेहरू का करीबी माना जाता था और उन्हें 4 कॉर्पस की कमान दी गई । लेकिन वो 1962 के युद्ध में भारत की भूमि को बचाने में असफल रहे । कौल ने मानेकशॉ को अपना संभावित प्रतिद्वंद्वी माना था। लेकिन जैकब ने यह भी जोड़ा कि मानेकशॉ को सरकार की अत्यधिक आलोचना की आदत थी.

जनरल वीके सिंहअपनी पुस्तक में कहा है कि मानेकशॉ के खिलाफ औपचारिक रूप से तीन आरोप लगाए गए थे। पहला यह कि वह देश के प्रति वफादार नहीं थे, क्योंकि उन्होंने अपने कार्यलाय में भारतीय नेताओं के बजाय ब्रिटिश वाइसराय और गवर्नर जनरलों की तस्वीरें लटका रखी थीं। दूसरा, वह एक सैन्य प्रशिक्षक के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहे थे जिसने भारतीयों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी। और तीसरा, मानेकशॉ ने साथी अधिकारियों की पत्नियों के बारे में कुछ अपमानजनक टिप्पणी की थी ।

ऐसा माना जाता है कि 1962 में चीन के खिलाफ युद्ध के बाद हुई भारत की पराजय ने मानेकशॉ को बचा लिया। मेनन और कौल को इस्तीफा देना पड़ा और मानेकशॉ को 4 कॉर्पस की कमान दे दी गई थी।जब नेहरू ने कौल को हटाकर सैम मानेकशॉ को 4 कोर का जनरल ऑफिसर कमांडिंग बनाकर भेजा। चार्ज लेते ही जवानों को उनका पहला ऑर्डर था, ‘जब तक कमांड से ऑर्डर न मिले मैदान ए जंग से कोई भी पीछे नहीं हटेगा और मैं सुनिश्चित करूंगा कि ऐसा कोई आदेश न आए।’ उसके बाद चीनी सैनिक एक इंच जमीन भी अपने कब्जे में नहीं ले पाए और आखिरकार युद्ध विराम की घोषणा हो गयी।

 पत्नी का नाम सिल्लो बोडे 

वे कमीशन मिलने के बाद वह भारतीय सेना में भर्ती हुए। 1937 में एक सार्वजनिक समारोह के लिए लाहौर गए सैम मानेकशॉ की मुलाकात सिल्लो बोडे से हुई। दो साल की यह दोस्ती 22 अप्रैल 1939 को विवाह में बदल गई। 1969 को उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया गया। 1973 में सैम मानेकशॉ को फ़ील्ड मार्शल का सम्मान प्रदान किया गया। 15 जनवरी, 1973 में मानेकशॉ सेना प्रमुख के पद से सेवानिवृत्त हुए। वृद्धावस्था में उन्हें फेफड़े संबंधी बीमारी हो गई थी वो कोमा में चले गए।उनकी मृत्यु 94 वर्ष की उम्र वेलिंगटन, तमिलनाडु के सैन्य अस्पताल के आईसीयू में हुई। रक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी बयान के मुताबिक 27 जून 2008 को रात 12:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।

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