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1962 में पीछे हटने के बाद धोखा दे चुका है चीन , इसलिए भारत की सेना सतर्क

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नई दिल्ली- गलवान घाटी से फिलहाल चीन की सेना ने पीछे हटने की शुरुआत कर चुकी है। भारत की सेना ने डेढ़ किलोमीटर पीछे हट गई है लेकिन भारत की नजर चीनी सेना के हरेक मूव पर है। लेकिन चीन अपनी धोखेबाजी के लिए मशहूर है। इसलिए उसकी बात पर बिल्कुल भरोसा नहीं किया जा सकता है। लोग सोशल मीडिया पर सरकार और सेना को चीन पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करने की सलाह दे रहे है और 1962 की एक अखबार की कटिंग वायरल हो रही है। ऐसे में सोशल मीडिया पर 15 जुलाई, 1962 को प्रकाशित एक अखबार की हेडलाइन वायरल हो रही है। ये हेडलाइन है ‘Chinese Troops Withdraw from Galwan Post’ यानी चीनी सेना गलवान पोस्ट से पीछे हट गई है।

गलवान घाटी से चीनी सेना के पीछे हटने को लेकर भारतीय सेना किसी भी तरह का ब्यौरा देने से हिचक रही है। उनका कहना है कि किसी भी तरह की झड़प से बचने के लिए भारतीय और चीनी सैनिक कुछ पीछे हटे हैं। उन्होंने कहा, ‘यह बहुत छोटे कदम हैं और हमें सावधान रहने की जरूरत है। चीन पर विश्वास नहीं किया जा सकता।’
इस सावधानी की एक वजह 15 जुलाई, 1962 को टाइम्स ऑफ इंडिया के रविवार अखबार का शीर्षक है क्योंकि इसके ठीक 96 दिन बाद 20 अक्तूबर को भारत और चीन के बीच युद्ध शुरू हो गया था। युद्ध गलवान घाटी में ही शुरू हुआ था।

जानिए 1962 में क्या हुआ था

1962 में गर्मियों के मौसम में भारत ने गलवान घाटी की किलेबंदी करके यहां गोरखाओं की तैनाती कर दी थी। छह जुलाई को चीनी सैन्य पलटन ने गोरखाओं को इलाके में घुसते हुए देखा और वापस जाकर मुख्यालय में इसकी सूचना दी। चार दिन बाद, 300 चीनी सैनिकों ने 1/8 गोरखा रेजिमेंट को घेर लिया था। 15 जुलाई को अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चीनी गलवां पोस्ट से 200 मीटर पीछे हट गए हैं। हालांकि कदम पीछे खींचने की समयावधि काफी छोटी थी और वे वापस आ गए। अगले तीन महीनों तक भारत और चीन ने एक दूसरे को विरोध पत्र सौंपे। नायक सूबेदार जंग बहादुर के नेतृत्व में गोरखाओं ने अपनी जमीन नहीं छोड़ी और भारत के सैन्य इतिहास में किंवदंती बन गए।

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अक्तूबर की शुरुआत में जब तापमान शून्य पर पहुंच गया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गोरखाओं के स्थान पर मेजर एसएस हसबनिस के नेतृत्व में 5 जाट अल्फा कंपनी को गलवान भेज दिया। चार अक्तूबर से एमआई-4 हेलिकॉप्टर उड़ान भरने लगे और अगले कुछ दिनों में यह प्रक्रिया पूरी हो गई। 20 अक्तूबर, 1962 को चीनी सेना ने गलवान पोस्ट पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसमें 36 भारतीय जवान शहीद हो गए। मेजर हसबनिस को पकड़ लिया गया।

इसके बाद आधिकारिक तौर पर 1962 की लड़ाई शुरू हो गई थी। मेजर हसबनिस ने पीओडब्ल्यू में सात महीने बिताए और युद्ध खत्म होने के बाद ही वे वापस आ पाए। संयोग से, उनके बेटे लेफ्टिनेंट जनरल हसबनिस वर्तमान में उप सेना प्रमुख हैं। सेना के अधिकारी 1962 की हेडलाइन की ओर इशारा करके यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वे चीनी सेना के पीछे हटने को लेकर सावधान क्यों हैं।

 

 

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