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आखिर क्यों एलएसी से पीछे हटना पड़ा चीन को , भारत की रणनीति ने पलटी चीन की चाल

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नई दिल्ली- भारत और चीन के बीच लगभग दो महीने से जारी गतिरोध अब शांत होने की  एक उम्मीद जगी है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ लगभग दो घंटे तक बातचीत की और हालात बेहतर होने की उम्मीद जताई। इसके बाद ही चीन की सेना ने अपने तंबू उखाड़े और अपने कदम पीछे खींचे। लेकिन चीन माना कैसे और 2 महीने के बाद दोनों देशों के बीच हालात कैसे सामान्य हुए, यह अभी भी सवाल बना हुआ है। एक सवाल यहां और भी खड़ा होता है कि क्या चीन अब मान जाएगा और आगे से कोई ऐसी हरकत नहीं करेगा जिससे कि दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति पैदा होगी? नए समझौते के मुताबिक दोनों देशों के बीच लगभग दो किलोमीटर का बफर जोन बनाया गया है। इस जोन में दोनों देशों के जवान नहीं आएंगे।

चीन की नीयत पर भरोसा नहीं किया जा सकता है

भारत की सेना चीन को बहुत अच्छी तरह समझना होगा। चीन में समाज में वादे का कोई महत्व नहीं होता है। ऐसा पहली बार नहीं है कि चीन पीछे हटने को राजी हुआ है। इसके पहले भी डोकलाम में हम चीन की बदनीयत से वाकिफ हैं। तीन दिन पहले पीएम मोदी ने एलएसी का दौरा किया था। इस दौरान चीन को बहुत बुरा लगा और चीन की ओर से कहा गया कि भारत कोई भी ऐसी हरकत न करे जिससे तनाव और बढ़े। हालांकि उसके बाद हालात सामान्य होने लगे। चीन अब गलवान घाटी इलाके से लगभग दो किलोमीटर खिसक पीछे खिसक गया है। लेकिन भारत उसकी हर हरकत पर पैनी निगाह बनाए हुए है।

दो किलोमीटर पीछे हटा चीन

चीनी सेना के 15 जून को एलएसी पर झड़प वाली जगह से पेट्रोल पॉइंट 14 से 1.5 से 2 किलोमीटर पीछे हटने की खबर है। भारतीय जवान भी पीछे आ गए और दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच एक बफर ज़ोन बना दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक, चीनी सैनिकों ने गलवान नदी के मोड़ से हटना शुरू कर दिया है और इस इलाके से अस्थायी ढांचों और टेंट को हटा दिया गया है। वर्तमान में, यह प्रक्रिया सिर्फ गलवान घाटी तक में सीमित है।

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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की डिएस्केलेशन पर पूरी नजर

सरकार के सूत्रों ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भारतीय सेना के साथ भारत और चीन सीमा स्थिति की लगातार निगरानी कर रहे हैं और दो देशों की सेना के बीच गतिरोध जल्द ही सुलझने की उम्मीद है। अजीत डोभाल और चीनी स्टेट काउंसिलर और विदेश मामलों के मंत्री वांग यी ने रविवार को एक टेलीफोन बातचीत के दौरान ‘फ्रैंक और इन-डीप एक्सचेंज’ किया, जिसके दौरान उन्होंने सहमति व्यक्त की कि दोनों पक्षों को एलएसी पर स्थिति सुधारने की प्रक्रिया जल्द खत्म करनी चाहिए।

पीएम के लेह दौरे पर सख्त संदेश से डरा चीन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को लद्दाख का अचानक दौरा किया था। वहां उन्होंने सैनिकों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा था कि विस्तारवाद के दिन अब लद गए हैं। इतिहास गवाह है कि ‘विस्तारवादी’ ताकतें मिट गई हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत न तो कभी झुका है और न आगे झुकेगा। उनके इस संबोधन को चीन के लिए यह स्पष्ट संदेश माना गया था कि भारत पीछे नहीं हटने वाला है और वह स्थिति से सख्ती से निपटेगा।

भारत की आर्थिक नाकेबंदी से डरा चीन

चीन की घेरेबंदी के लिए भारत ने उसकी आर्थिक मोर्चे पर नकेल कसने शुरू की है तो बीजिंग की बेचैनी बढ़ गई है। हाईवे प्रोजेक्ट से लेकर एमएसएमई सेक्टर में चीनी कंपनियों के रास्ते बंद करने की घोषणा की गई है। इस दिशा में सबसे अहम फैसला चीन के 59 ऐप पर पाबंदी लगाने का जिसमें दुनिया में बेहद लोकप्रिय कई ऐप भी हैं। कोविड महामारी से बढ़ी आर्थिक चुनौती में कमजोर पडऩे वाली भारतीय कंपनियों में चीनी हिस्सेदारी रोकने की दिशा में पहले ही कदम उठाया जा चुका था।

भारत की कूटनीति भी भारी पड़ी चीन पर

एलएसी पर चीनी अतिक्रमण के खिलाफ भारत की कूटनीतिक मोर्चे पर सक्रियता से भी चीन पर दबाव बढ़ा है। अमेरिका सीधे तौर पर लगातार चीन को घेर ही नहीं रहा बल्कि उसका साफ कहना है कि चीन अपने पड़ोसियों को परेशान कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से लेकर विदेश मंत्री माइक पोंपियो चीन के मसले पर खुलकर भारत का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिका ने यूरोप से अपनी सेनाओं को काफी संख्या में हटाकर चीन की चुनौती के लिए तैयार रखने की बात कह साफ कर दिया कि भारत के साथ सैन्य संघर्ष यदि हुआ तो इसका आकार बढ़ भी सकता है। चीन के खिलाफ भारत के आर्थिक प्रतिबंध के फैसलों का भी अमेरिका समेत कई देशों ने समर्थन किया। विश्व बिरादरी के अहम देश फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी खुलकर भारत के रुख को सही ठहराया है।

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