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विकास दुबे का अंत हुआ तो क्या अपराध का अंत हुआ ?उत्तरप्रदेश के 403 विधायकों में से 143 पर अपराधिक मामले ,, भाजपा के 61 सांसदों में से 35 सांसद है दागी

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नई दिल्ली – कानपुर कांड का सरगना विकास दुबे गुरुवार की सुबह उज्जैन से गिरफ्तार हुआ। पुलिस के 8 घंटे पुछताछ के बाद विकास को यूपी एसटीएफ उज्जैन से कानपुर ला रही थी। गिरफ्तारी करने में असफल रही कानपुर पुलिस ने एनकाउंटर का कोई मौका नही छोड़ती । यूपी एसटीएफ कानपुर से 15 किलोमीटर पहले ही विकास को एनकाउंटर कर मार गिराया। और इस तरह से विकास दुबे की कहानी का अंत हुआ, तो क्या अपराध का भी अंत हुआ? ये सवाल इसलिए क्योंकि समाज के भीतर अपराध और राजनीति सिक्के के दो पहलू है। एक अदद वोट जिस किसी को भी आ जाए लोकतंत्र में वह इस समाज का राजा होता है चाहे वह कोई अपराधी प्रवृत्ती का ही क्यों न हो, यह तो विकास दुबे का ही दुर्भाग्य था कि वर्तमान में वह न किसी पार्टी का नेता था और न ही लोकतंत्र में उम्मीदवार ।

विकास दुबे जिस जिस प्रदेश से ताल्लुक रखते थे उस प्रदेश की वर्तमान सच्चाई ये है कि सत्ता में बैठे 37 फीसदी विधायकों पर अपराध के मामले दर्ज है। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी से 2019 में चुनकर आए यहां के 80 लोकसभा सांसदों में से 44 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। जबकि, 2017 के विधानसभा चुनाव में चुनकर आए 403 विधायकों में से 147 विधायकों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं।

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उत्तर प्रदेश में साल 2017 में हुए विधान सभा चुनाव में कुल 403 सीटों के लिए 4 हजार 823 उम्मीदवार उतरे थे। उसमें से 17% यानी 859 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। इन 859 में से भी 704 तो ऐसे थे, जिनपर गंभीर आपराधिक मामले थे। गंभीर अपराध यानी ऐसे अपराध जिनमें 5 साल या उससे ज्यादा की सजा मिलती हो या गैर-जमानती हो।

ये तो हो गई कुल उम्मीदवारों की बात। जबकि, यहां के विधानसभा चुनाव में भाजपा, सपा, बसपा, आरएलडी और कांग्रेस ने 1 हजार 480 उम्मीदवार उतारे थे। उसमें से 492 उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले थे। इस हिसाब से विधानसभा चुनाव में इन पांचों पार्टियों ने जितने उम्मीदवार उतारे थे, उसमें से 33% से ज्यादा पर आपराधिक मामले दर्ज थे।

अपराधनीति
                                                                                                             अपराधनीति

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