लेबनान में 1975-1990 के गृह युद्ध के बाद एक नई राजनीतिक व्यवस्था लाई गई थी। इसके तहत यह तय हुआ था कि देश का राष्ट्रपति ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुस्लिम और संसद का अध्यक्ष एक शिया मुसलमान होगा। संसद की सीटों को दो बराबर भागों में मुस्लिमों और ईसाईयों में बांटा गया, नौकरशाही में भी यही नियम लागू किया गया। लेबनान में 27 फीसदी शिया मुस्लिम, 27 फीसदी सुन्नी मुस्लिम, करीब 40 फीसदी ईसाई और छह फीसदी द्रूज़ेआबादी है। माना जाता है कि देश के सभी समुदाय के लोगों को संतुष्ट रखने के लिए ही नया राजनीतिक सिस्टम लाया गया था।

लेकिन, कुछ समय बाद ही इस सिस्टम की कमियां सामने आने लगीं। दरअसल, शिया, सुन्नी और ईसाई तीनों ही राजनीतिक गुट अपने-अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए अलग-अलग बाहरी ताकतों के करीब हो गए। यहां की सुन्नी मुसलमानों की पार्टियों पर सऊदी अरब का प्रभाव रहता है। हिज़्बुल्लाह  जैसे आंतकी संगठन ईरान के करीब हैं। इसी तरह देश की ईसाई पार्टियों पर फ्रांस का प्रभाव माना जाता है।