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बुर्का, शरिया, मौलाना, मदरसा पर चुप्पी: जस्टिस काटजू ने ‘सेकुलर’ गैंग को लताड़ा

काटजू ने कहा कि 2014 से भारत में जो बहुसंख्यकवाद शुरू हुआ, वो उससे पहले दशकों तक सेकुलर पार्टियों द्वारा की गई हरकतों का नतीजा था। उन्होंने इसके पीछे मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टिकरण को कारण बताया। उन्होंने गिनाया कि कैसे हिन्दू लॉ को तो हटा दिया गया, लेकिन शरिया और तीन तलाक को बरकरार रखा गया।

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नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मार्कण्डेय काटजू आज कल बदले बदले नजर आ रहे हैं। अभी तक हिंदू रिचुअल्स के खिलाफ बोलते रहे काटजू ने सेकुलर गैंग को मुस्लिम पिछड़ेपन के खिलाफ नहीं बोलने पर लताड़ा है। उन्होंने कहा है कि सेकुलरिज्म वनवे ट्रैफिक नहीं हो सकता है। उन्होंने सेकुलर गैंग की मुखिया राणा अय्युब, आरफा खानम शेरवानी, उमर खालिद , सिद्धार्थ वरदराजन, कन्हैया कुमार , शेहला रशीद से सवाल पूछा है कि वो क्यों बुर्का , शरिया ,मदरसा और मौलानाओं की निंदा नहीं करते हैं।

उन्होंने कहा है कि कन्हैया कुमार, शेहला रशीद और उमर खालिद जैसे जेएनयू के पूर्व छात्र नेता हिन्दू कट्टरवाद पर जम कर निशाना साधते हैं, लेकिन बुर्का, शरिया, मदरसा और मौलानाओं की कभी निंदा नहीं करते हैं। मार्कण्डेय काटजू ने इसके पीछे कारण बताते हुए कहा है कि ये सब चुनावों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

उन्होंने एक के बाद एक कई ट्वीट करके सवाल दागे हैं। उन्होंने इस्लामी कट्टरवादी पत्रकार राणा अयूब का एक वीडियो भी शेयर किया है। बकौल काटजू, इस वीडियो में अयूब ‘सेकुलरिज्म चैंपियन’ हैं और हिन्दू कट्टरवाद का विरोध करती हैं, लेकिन इस्लामी पिछड़ेपन पर कोई बात नहीं करती।

इस्लाम पर नहीं बोलता सेकुलर गैंग

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काटजू ने कहा कि 2014 से भारत में जो बहुसंख्यकवाद शुरू हुआ, वो उससे पहले दशकों तक सेकुलर पार्टियों द्वारा की गई हरकतों का नतीजा था। उन्होंने इसके पीछे मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टिकरण को कारण बताया। उन्होंने गिनाया कि कैसे हिन्दू लॉ को तो हटा दिया गया, लेकिन शरिया और तीन तलाक को बरकरार रखा गया। उन्होंने राजीव गाँधी द्वारा शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने की भी चर्चा की।

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उन्होंने कहा है जैस ही वो बुरका , शरीया की आलोचना करते हैं लोग उन्हें कम्युनल कहना शुरू कर देते हैं। काटजू ने कहा कि पत्रकार आरफा खानम शेरवानी का सेकुलरिज्म ज्यादा से ज्यादा पाकिस्तान में हिन्दू मंदिर के निर्माण का समर्थन करने तक ही सीमित है। उन्होंने पूछा कि क्या वो मदरसों, मौलानाओं, शरिया और बुर्का का विरोध कर सकती हैं, जिन चीजों ने मुसलमानों को हमेशा पिछड़ा बनाए रखा। उन्होंने कहा कि आरफा और अयूब अगर सच में सेकुलर हैं तो क्या वो इन चीजों को हटाने का समर्थन करते हुए मुसलमानों को आधुनिक बनाने की कोशिश कर सकती हैं।

आपको बता दें कि आरफा खानम ने शेरवानी पहले यह मानने से इनकार  कि तबलीगी जमात वाले महिलाओं के साथ बदसलूकी या उनका शोषण कर सकते हैं। उसने कहा था कि जमाती नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने वाले लोग हैं, जो मजहब/समाज की सेवा के लिए दुनियादारी, यहॉं तक कि अपने परिवार से भी दूर रहते हैं।

मार्कण्डेय काटजू ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि जब वो हिन्दू कट्टरपंथ पर बोलते हैं तो मुसलमान उनकी खूब प्रशंसा करते हैं। लेकिन जैसे ही उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथ और ग़लत रिवाजों पर बोलना शुरू किया तो मुसलमानों ने उन्हें साम्प्रदायिक बताया ही। साथ में ये भी कहा कि वो कभी सेकुलर नहीं बन सकते। उन्होंने कहा कि सेकुलरिज्म ‘वन वे ट्रैफिक’ नहीं हो सकता। जस्टिस काटजू ने पत्रकार बरखा दत्त और सिद्धार्थ वरदराजन से भी उनके सेकुलरिज्म पर सवाल पूछा है।

 

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