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रिया चक्रबर्ती: आरोपी या गुनहगार? जरूरत से ज्यादा न्याय भी किसी के लिए अन्याय की श्रेणी में आता है, पढ़े पूरी रिपोर्ट

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नई दिल्ली, अंकित मिश्रा – आरोपी और गुनहगार के बीच की मोटी परत को धूमिल किया जाना कितना उचित है? क्या एक आरोपी को मानसिक यातनाएं देना अपराध के दायरे में नहीं लाना चाहिए? कानून में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “आरोपी तब तक निर्दोष है जब तक उस पर लगाए गए दोष सिद्ध नहीं हो जाते”।

फिल्म अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को तमाम मीडिया संस्थान व कुछ विशेष दल अभी से ही क्यों दोषी मान बैठे हैं? क्यों संविधान के अंदर अनुसूची 21 में दी गई “जीवन और स्वतंत्रता” के मौलिक अधिकारों के ताड़-ताड़ होने पर भी लोग खामोश हैं?

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का जाना अपूरणीय क्षति है और हर कोई इस मामले की सच जानना चाहता हैं, किंतु नफरत का जो माहौल अभी से ही रिया चक्रवर्ती के लिए बना दिया गया है क्या वह किसी सजा से कम है? तो क्या न्यायिक व्यवस्था उस दौर में पहुंच चुकी है कि आरोपी को गुनहगार साबित होने से पहले ही सजा मुकर्रर कर दी जाए? रिया चक्रवर्ती व उनके परिवार को दी जाने वाली यातनाओं की समीक्षा बेहद आवश्यक है।

आरोपी रिया या गुनहगार

एनसीबी दफ्तर के बाहर रिया चक्रबर्ती को पत्रकारों की भीड़ ने इस कदर घेर लिया मानो आईएसआईएस का कोई सरगना फांसी पर लटकाए जाने से महज चार कदम की दूरी पर हो और वे पत्रकार गुस्साई हुई जनता के नफरत से भरे सवालों को उस आतंकवादी पर उड़ेल देना चाहते हों। भाई साहब वह केवल एक आरोपी है फिलहाल। उसकी मनोदशा को भी समझिए।

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देश की न्यायपालिका पर भरोसा नहीं रहा या खुद को न्यायपालिका से भी ऊपर समझने लगे हो? कोरोना जैसी महामारी में पत्रकारों के उस अनियंत्रित भीड़ से कोई सवाल क्यों नहीं कर रहा है? जिस सामाजिक दूरी के पालन की बात प्रधानमंत्री करते हैं क्या वह इन पत्रकारों पर लागू नहीं होता है? रिया चक्रवर्ती के साथ हो रही प्रताड़ना पर मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग क्यों चुप है? एक आरोपी को मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों के हनन होने पर भी न्यायपालिका क्यों चुप है? आरोपी के खिलाफ हो रही कार्रवाई को क्यों सार्वजनिक किया जा रहा है? क्या सीबीआई खुफिया एजेंसी नहीं रही? किसी के निजी व्हाट्सएप चैट को सार्वजनिक करना कितना उचित है? ऐसे कई और सवाल हैं पर इसकी सुध कौन लेगा?

आरोपी रिया या गुनगहार

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मीडिया ट्रायल से जांच प्रभावित नहीं हो रही है इस बात की गारंटी कौन लेगा? बिहार चुनाव के वजह से इस मामले को तूल देने का जो आरोप लग रहा है वह भी अब उचित मालूम पड़ता है। कला एवं संस्कृति प्रकोष्ठ, भाजपा (बिहार प्रदेश) के द्वारा जारी किए गए पोस्टर से आरोप सिद्ध होते नजर आते हैं। “ना भूले हैं! ना भूलने देंगे!!” जैसे नारे के साथ यह स्पष्ट दिखता है कि इस मामले का राजनीतिकरण पहले से तय था। तो ऐसे में सवाल मीडिया व इंटरनेट पर विचरण कर रहे तमाम कथित न्यायधीशों से बनता है।

आगामी दिनों में यदि सीबीआई रिया चक्रबर्ती के खिलाफ सबूत इक्कठा नही कर पाती है तो क्या करोगे आप? यदि आरोपियों के साथ यही व्यवहार उचित है तो फिर तमाम राजनीतिक पार्टियों में ऐसे हजारों नेता हैं जिन पर कोई ना कोई मामला दर्ज है उनके साथ भी यही कीजिए। यदि आपको इतनी ही जल्दबाजी है तो सरकार से पूछिए कि क्या कोई समय सीमा निर्धारित की जा सकती है जिसमें कि इस जांच का फैसला आ सके? हां वह तारीख यदि बिहार विधानसभा चुनाव के इर्द-गिर्द घूमें तो फिर उसे क्या एक महज संयोग समझा जाए?

आरोपी रिया या गुनगहार

आज हमें नहीं मालूम कि सुशांत सिंह राजपूत हमारे बीच क्यों नहीं हैं किंतु यदि कल को रिया के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है तो इसके जिम्मेदार तमाम मीडिया संस्थान व वर्तमान दौर की यह इंटरनेट की न्यायपालिका होगी। सरीखे से तमाम मीडिया संस्थान पर जांच में बाधा डालने के लिए कार्यवाही भी होनी चाहिए। सीबीआई को अपना काम करने दीजिए और किसी को गुनहगार तब तक नहीं बनाइए जब तक की उसपर जुर्म साबित ना हो जाए व देश की न्यायपालिका उसे दोषी ना मान ले। सुशांत सिंह राजपूत को इंसाफ मिले यह हम सभी की इच्छा है, बस यह ध्यान रहे कि जरूरत से ज्यादा न्याय भी किसी के लिए अन्याय की श्रेणी में आता है।

इस रिपोर्ट को पढ़कर आप क्या सोचते हैं अपनी विचार हमें जरूर बताएं , मेरा ट्वीटर हैंडल है @mishrajee98

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