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हाथरस की निर्भया की मौत- कब बदलेगा पुलिस और समाज का रवैया

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नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश के हाथरस की निर्भया जिंदगी की जंग हार गई।हैवानों ने गैंगरेप के बाद उसकी जीभ भी काट दी थी। उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई थी। वारदात के बाद वह एक हफ्ते से ज्यादा बेहोश रही थी। सोमवार को ही हालत खराब होने के बाद किशोरी को सफदरजंग हॉस्पीटल दिल्ली ले जाया गया था। मंगलवार की सुबह लगभग चार बजे उसने दम तोड़ दिया। यह बहुत दुखद खबर है। इस पूरे मामले में पुलिस का ढीला रवैया सामने आ रहा है। पुलिस अब भी गैंगरेप की बात को स्वीकार नहीं कर रही है।

14 सितम्बर को हुआ था रेप

हाथरस के थाना चंदपा इलाके के गांव में 14 सितंबर को चार दबंग युवकों ने 19 साल की दलित लड़की के साथ बाजरे के खेत में गैंगरेप किया था। इस मामले में पुलिस ने लापरवाही भरा रवैया सामने आया । रेप की धाराओं में केस ना दर्ज करते हुए छेड़खानी के आरोप में एक युवक को हिरासत में लिया। इसके बाद उसके खिलाफ धारा 307 (हत्या की कोशिश) में मुकदमा दर्ज किया गया था। सवाल ये उठता है कि आखिर पुलिस प्रथम दृष्टया यह क्यों पता नहीं लगा पायी की उसके साथ बहुत भयानक अपराध हुआ है या पुलिस ने लड़की के दलित समाज से होने की वजह से मामले को इतनी गम्भीरता से नहीं लिया अथवा पुलिस आरोपियों के उच्च जाति के होने की वजह से उनको बचाने की कोशिश में जुट गई।

पीड़िता 9 दिन बाद होश में आई उसने अपने साथ हुई आपबीती अपने परिजनों को सुनाई फिर भी पुलिस मामले की गंभीरता को नहीं समझी। आजतक को दिए अपने बाइट में हाथरस के एसएसपी अभी भी रेप की बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

निर्भया के बाद बस कानून बदले हैं

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निर्भया केस के बाद देश में एक अलग ही आंदोलन देखने को मिला। जिसकी वजह से सरकार पर कानून बदलने का दवाब पड़ा । कानून में बदलाव भी हुए लेकिन क्या देश में रेप के मामलों में कमी आ गई है। अगर हम डाटा का अध्ययन करें तो पाते हैं कि निर्भया के बाद भी देश में रेप और छेड़छाड़ के मामलों में कोई कमी नहींं हैं। 16 दिसम्बर, 2012 को हुए निर्भया कांड के बाद 3 फरवरी 2013 को क्रिमिनल लॉ अम्नेडमेंट ऑर्डिनेंस आया। जिसके तहत आईपीसी की धारा 181 और 182 में बदलाव किए गए। इसमें बलात्‍कार से जुड़े नियमों को कड़ा किया गया। रेप करने वाले को फांसी की सजा भी मिल सके, इसका प्रावधान किया गया। 22 दिसंबर 2015 में राज्यसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल पास हुआ। इस एक्ट में प्रावधान किया गया कि 16 साल या उससे अधिक उम्र के बालक को जघन्य अपराध करने पर एक वयस्क मानकर मुकदमा चलाया जाएगा।

कानून बदले पर पुलिस का रवैया नहीं

देश के अधिकांश पुलिस का अगर मेट्रो सिटीज को छोड़ दिया जाए तो महिलाओं के प्रति होने बाले क्राइम को लेकर पुलिस का रवैया बहुत ढीला है। देश के विभिन्न थानों के पुलिस बीट कांस्टेबल का रवैया क्षेत्र में तानाशाही भरा होता है। पुलिस के लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों में बिल्कुल भी एहसास नहीं होता है कि वो जिस नौकरी को कर रहे हैं उसका उद्देश्य समाज सेवा है , कानून व्यवस्था बनाए रखना है। लेकिन पुलिस का रवैया इसके बिल्कुल उलट होता है।

समाज की भी जिम्मेदारी है

हमारे देश समाज की संरचना इतनी जटिल है कि किसी गंभीर अपराध में संलिप्त रहे अपराधी का समाज से बॉयकॉट नहीं होता है। समाज के रेप जैसे क्राइम को बहुत आसान से डील किया जाता है। रेप जैसे गंभीर अपराध के लिए कई बार सामाजिक पंचायतें बहुत ही आसान सा दंड देकर और पीड़ित परिवार पर दवाब डाल कर समझौता करा देंती हैं। इसलिए देश को महिलाओं के प्रति अपराध पर रोक लगाने के लिए समाज सुधार से लेकर पुलिस सुधार और न्यायिक सुधार सभी के आवश्यकता है।

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