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चिराग पासवान का अलग होना , NDA को दे सकता है झटका

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पटना- बिहार में नामाकंन का दौर शुरू हो गया है। इसके बावजूद एनजीए में अभी तक सीट बंटवारे का मामला नहीं सुलझा है। चिराग पासवान 42 से कम सीट पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। आज शाम चिराग पासवान एलजेपी के संसदीय दल के साथ बैठक कर रहे हैं जिसके बाद साफ हो जाएगा कि वो एनडीए के साथ चुनाव लड़ेंगे या फिर अकेले के दम पर बिहार के रण में उतरेंगे।

एक तरफ बिहार में एनडीए के नेता के रूप में नीतीश कुमार चिराग पासवान को ज्यादा तवज्जो देने के मूड में नहीं हैं। लेकिन बीजेपी नहीं चाहती है कि चिराग पासवान अलग राह पकड़ें। क्योंकि बिहार चुनाव पासवान वोट भी मायने रखते हैं। एनडीए को करीब 5 प्रतिशत वोटों से हाथ धोना होगा। दूसरा अभी अभी अकाली दल ने भी बीजेपी से नाता तोड़ा है ऐसे में बीजेपी नहीं चाहेगी कि एलजेपी भी बीजेपी से नाता तोड़ कर अलग हो जाए।

अगर एलजेपी – एनडीए के साथ न रहे तो कितना नुकसान होगा

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अब सवाल उठता है कि अगर एलजेपी एनडीए से नाता तोड़ कर अलग हो जाती है तो एनडीए को कितना नुकसान उठाना पड़ेगा। अगर आंकड़ों पर गौर करें तो 2015 विधानसभा चुनाव में एलजेपी जिन 42 सीटों पर लड़ी उनमें से सिर्फ दो ही सीटें जीत पाई थी- लालगंज और गोविंदगंज। एलजेपी के अध्यक्ष रामविलास पासवान के कई करीबियों को चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा था।

2005 एलजेपी के लिए सबसे अच्छा साल साबित हुआ था उसके बाद से ही एलजेपी का रिपोर्ट कार्ड खराब होता रहा है। 2005 में पार्टी ने अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था जिसमें 178 सीटों पर लड़कर 29 सीटों पर जीत हासिल की थी। वोट  12 प्रतिशत के करीब रहा था । लेकिन छह महीने बाद दोबारा हुए चुनाव में 203 में से वे 10 सीटें ही जीत पाए। उसके बाद 2010 में एलजेपी ने राजद के साथ चुनाव लड़ा और 75 में से तीन सीटें जीतीं। वोट प्रतिशत 6.74 फ़ीसदी पर आ गिरा। 2015 में वोट प्रतिशत 4.83 पर आ गया।

इस तरह 2015 के चुनाव को भी मानक माना जाए तो एलजेपी के पास करीब 5 प्रतिशत वोट हैं। अगर एलजेपी एनडीए से अलग होती है तो एनडीए को 5 प्रतिशत वोटों का नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसलिए बीजेपी नहीं चाहती है कि एलजेपी गठबंधन से नाता तोड़े।

नीतीश ने पहले कर लिया है एलजेपी के विकल्प का इंतजाम

नीतीश कुमार को चतुर राजनैतिज्ञ माना जाता है कि एलजेपी के नखरों को देखते हुए नीतीश कुमार ने पहले ही उनके विकल्प जीतनराम मांझी को एनडीए में शामिल करा दिया है। जीतनराम मांझी के पार्टी हम का प्रभाव में करीब पांच प्रतिशत महादलित समुदाय पर है।

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