Thejantarmantar
Latest Hindi news , discuss, debate ,dissent

- Advertisement -

क्या अर्नब गोस्वामी को निशाना बनाया जा रहा है ? एक पूर्व पत्रकार के चुभते हुए सवाल

149

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

- Advertisement -

नई दिल्ली-  मुंबई पुलिस के कमिश्नर परमबीर सिंह ने प्रेस कांन्फ्रेंस कर बताया है  कि मुंबई काइम ब्रांच ने नए रैकेट का खुलासा किया है। इसका नाम ‘फॉल्स टीआरपी रैकेट’ है। ये रैकेट करोड़ों रुपये के राजस्व का मुनाफा कमा रहा था। इस मामले में पुलिस कमिश्नर ने सीधे तौर पर रिपब्लिक टीवी को आरोपी मानते हुए कहा कि चैनल ने पैसे देकर रेटिंग बढ़ाई। टीआरपी रैकेट के जरिए पैसा देकर TRP को मैन्युपुलेट  किया जा रहा था। ऐसा मुम्बई पुलिस के कमिश्नर परमवीर दहिया का कहना है।

Mumbai police to probe Republic TV for rigging ratings to spread fake narratives

रिपब्लिक के साथ इस मामले दो छोटे चैनलों को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया है। पुलिस ने एक व्यक्ति को भी गिरफ्तार किया है। दोनों चैनलों के नाम फख्त मराठी और बॉक्स सिनेमा हैं। मुंबई पुलिस की ओर से इस रैकेट की जानकारी सूचना प्रसारण मंत्रालय और भारत सरकार को दी जाएगी।

वहीं इस पुलिस की यह कार्रवाई भी सवालों के घेरे में है। पूर्व पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य ने इसको लेकर लम्बा चौड़ा फेसबुक पोस्ट लिखा है। उन्होंने लिखा है

- Advertisement -

मुंबई पुलिस कमिश्नर परमजीत सिंह ने अभी प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि दो छोटे चैनल्स और रिपब्लिक टीवी के खिलाफ "TRP रेटिंग…

Sumant B द्वारा इस दिन पोस्ट की गई गुरुवार, 8 अक्तूबर 2020

“मुंबई पुलिस कमिश्नर परमजीत सिंह ने अभी प्रेस कांफ्रेंस कर बताया कि दो छोटे चैनल्स और रिपब्लिक टीवी के खिलाफ “TRP रेटिंग मैन्युपिलेशन” का मामला दर्ज कर करवाई की जा रही है। परमजीत सिंह की प्रेस कांफ्रेंस से कुछ नतीजे निकाले जा सकते हैं।
■ मुंबई पुलिस अब “कॉरपोरेट वॉर” का टूल बन चुकी है।
■ मैन्युपिलेशन के नतीजे मुंबई में लगे सिर्फ दो हजार टीआरपी बॉक्स से निकाले गए हैं।
■ टीआरपी बॉक्स की इतनी मामूली संख्या से कई सौ करोड़ की “एडवर्टिजमेंट रेवेन्यू” को अपने पक्ष में कर लेने की बात सोचना भी मुंबई पुलिस के “दिमागी दिवालिएपन” को सार्वजनिक कर रहा है।

- Advertisement -

■ एडवरटाइजर दो-तीन सप्ताह की टीआरपी रेटिंग पर निर्णय नहीं लेते। रेटिंग में लंबे समय की स्थिरता के बाद एडवरटाइजर कोई निर्णय लेते हैं।
■ परमजीत सिंह बार-बार केवल मुंबई में लगे टीआरपी बॉक्स की संख्या का जिक्र कर रहे थे, देशभर के बॉक्स की संख्या ना बताई, ना किसी पत्रकार ने पूछा। इससे आम दर्शक को समझ आता, रेटिंग से एडवर्टिजमेंट और एडवर्टिजमेंट से रेवेन्यू खींचने में दो हजार टीआरपी बॉक्स की क्या अहमियत है ?
■ परमजीत सिंह का आरोप है, रिपब्लिक और दो छोटे चैनल्स ने उन 2000 घरों के मालिकों को महीने के 400 से 500 ₹ दिए। ताकि ज्यादा से ज्यादा वक्त इन चैनल्स को चलाते रहें। इससे इनकी टीआरपी रेटिंग बढ़े।
■ यह भी गजब की थ्योरी है। यदि 500 रुपए प्रति घर/प्रति महीने भी मान लिया जाए तो भी 10 लाख रुपए महीने के बनते हैं। क्या दस लाख महीने के खर्च पर 40,000 हजार करोड़ का धंधा बनता है ? ऐसा संभव है ? यदि वाकई ऐसा है तो टीआरपी सिस्टम वाकई लबर-धों धों है।
■ दूसरे, मुंबई पुलिस यह कैसे साबित करेगी कि टीआरपी बॉक्स वाले इन दो हज़ार घर मालिकों को पैसा “रेटिंग मेन्युपिलेशन” के लिए दिए गए। बिजनेस प्रमोशन कोई भी तरीका सामने रखा जा सकता है। जिसे टीआरपी बॉक्स से जोड़ना लगभग नामुमकिन है।
■ टीआरपी बॉक्स आमतौर पर बस्ती, झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में लगाए जाते हैं। जिनको पुलिस आसानी से धमका कर बयान ले सकती है। इस पर ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
■ आप हैरान होंगे, महानगर कोलकाता के मुकाबले हावड़ा में टीआरपी बॉक्सेस की संख्या दो गुनी है। वहां बस्ती हैं। पार्टी कॉडर है। बदले में खबरिया/मनोरंजन चैनल पार्टियों को महीने की मोटी रकम देते हैं। पूरा माल कोई चैनल अकेले थोड़े हजम कर जाता है।
■ टीआरपी बॉक्स मैन्युपुलेशन में शिकायतकर्ता BARC है। जो टीआरपी बॉक्स और रेटिंग को संचालित करता है। नियमित करता है। यह सूचनाएं BARC के पास रहती है। यानी इनफार्मेशन लीकेज BARC से हुआ। बावजूद, BARC को पड़ताल से बाहर रखा गया। क्यों ?
■ परमजीत सिंह सैकडों पत्रकारों के बीच से “गुप्ता और गणेश” का नाम लेकर सवाल पूछने को आमंत्रित कर रहे थे। रिश्ते अंदरूनी कहानी बता रहे हैं। कसम से यदि अपन होते तो दो सवालों पर पोंक देते आदरणीय कमिश्नर साहब!
■ कुल मिलाकर मुंबई पुलिस मामले में मुंह की खाने जा रही है। यदि यह कोई मामला है भी, तो यह “प्रवर्तन निदेशालय” का मामला है, ना कि पुलिस का। कोर्ट में पहली सुनवाई में परमजीत सिंह के नेतृत्व वाली मुंबई पुलिस मुंह की खाएंगे। तय मानिए। और फायदा रिपब्लिक को मिलेगा।
बावजूद, अपन इस कारपोरेट वॉर के हिस्से नहीं हैं। ना आजतक के। ना रिपब्लिक के। इस दुनिया को बहुत भीतर तक देख-समझ चुके हैं। कारोबारी राष्ट्रवाद से “सुरक्षित दूरी” बनाए रखते हैं।

- Advertisement -

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More