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रेप के केसों में पुलिस की टाल-मटोल से खुश नहीं हैं गृहमंत्री, दिए सख्त कदम उठाने के निर्देश

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नई दिल्ली- हर रोज सामने आ रही रेप की वारदातों से देश के गृहमंत्री अमित शाह खुश नहीं है। गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा कि रेप के मामलों में सख्ती से निपटा जाए और पुलिस हर मामले की एफआईआर दर्ज करे। हाथरस कांड में जिस तरह से पुलिस ने शुरू में हीला हवाली की थी उससे भी गृहमंत्रालय खुश नहीं है ऐसे अधिकारियों के खिलाफ में कड़ा कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। पीड़‍िताओं को अक्‍सर थाने के चक्‍कर काटने पड़ते हैं। MHA ने साफ कहा है कि एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी न की जाए। अपनी एडवाइजरी में गृह मंत्रालय ने कहा है कि एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। मंत्रालय ने आईपीसी और सीआरपीसी के प्रावधान गिनाते हुए कहा कि राज्‍य/केंद्रशासित प्रदेश इनका पालन सुनिश्चित करें।

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क्या कहा गया है गृहमंत्रालय की एडवाइजरी में

  • अपराध की स्थिति में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। कानून में ‘जीरो एफआईआर’ का भी प्रावधान है। इसलिए पुलिस मामला थाना क्षेत्र के बाहर होने का बहाना नहीं बना सकती है।
  • इंडियन एविडेंस ऐक्‍ट की धारा 32(1) के अनुसार, मृत व्‍यक्ति का बयान जांच में अहम तथ्‍य होगा।
  • IPC की धारा 166 A(c) के तहत, एफआईआर दर्ज न करने पर अधिकारी को सजा का प्रावधान है।
  • सीआरपीसी की धारा 173 में बलात्‍कार से जुड़े मामलों की जांच दो महीनों में करने का प्रावधान है। MHA ने इसके लिए एक ऑनलाइन पोर्टल बनाया है जहां से मामलों की मॉनिटरिंग हो सकती है।
  • सीआरपीसी के सेक्‍शन 164-A के अनुसार, बलात्‍कार/यौन शोषण की मामले की सूचना मिलने पर 24 घंटे के भीतर पीड़‍िता की सहमति से एक रजिस्‍टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर मेडिकल जांच करेगा।
  • फोरेंसिंक साइंस सर्विसिज डायरेक्‍टोरेट ने यौन शोषण के मामलों में फोरेंसिंक सबूत इकट्ठा करने, स्‍टोर करने की गाइडलाइंस बनाई हैं। उनका पालन हो।
  • अगर मामले में पुलिस की  लापरवाही सामने आती है तो ऐसे अधिकारियों के खिलाफ सख्‍त से सख्‍त कार्रवाई होनी चाहिए।

आखिर क्या जरूरत पड़ एडवाइजरी की

अक्सर महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों में पुलिस की संवेदनहीनता सामने आती रहती है। पुलिस पहले तो एफआईआर करने में आनाकानी करती है। इनके बाद सुबूत जुटाने में भी लापरवाही होती है जिससे अधिकांश तथ्य नष्ट हो जाते हैं। फोरेंसिक एवीडेंस जुटाने के मामले में लापरवाही बरती जाती है जिससे पीड़िता का केस कमजोर होता है और आरोपियों को गुनाह करके बच निकलने में भी मदद मिलती है।

 

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