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तेजप्रताप के लिए आसान नहीं है हसनपुर का रण, जानिए क्या कहते हैं आंकड़े

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पटना- बिहार में रणभेेरी बज चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रण में उतर चुके हैं। बिहार का चुनाव प्रचार अपने अपने चरम पर है। पहले चरण के चुनाव में लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप का भाग्य 28 अक्टूबर को ईवीएम में बंद हो जाएगा। आइये जानते है कि कितना आसान और मुश्किल है तेजप्रताप के लिए हसनपुर का रण? आंकड़े क्या कहते हैं।

दरअसल हसनपुर सीट जबसे बने है तब से इस सीट पर यादवों का वर्चस्व रहा है। तब से अभी तक किसी भी पार्टी से  विधायक यादव ही बनते आ रहे हैं। इसलिए तेजप्रताप ने इसे सुरक्षित सीट मानकर चुना है। तेजप्रताप महुआ को लेकर संशय की स्थिति में थे इसलिए उन्होंने हसनपुर को चुना है। आरजेडी के रणनीतिकारों को लगता है कि हसनपुर को तेजप्रताप आसानी से फतह कर लेंगे। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि आरजेडी बहुत आसानी से फतेह कर लेंगे।

एक दृष्टि हसनपुर के राजनैतिक इतिहास पर

हसनपुर सीट यादव बाहुल्य सीट माना जाती है और कुशवाहा वोटर भी अच्छी खासी संख्या में हैं। हसनपुर सीट का इतिहास देखें तो इस सीट पर 1967 के बाद से हमेशा यादव समाज का ही झंडा बुलंद रहा है। यादव समाज से आने वाले गजेंद्र प्रसाद हिमांशु ने इस सीट को 8 बार जीतकर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है। हिमांशु स्थानीय होने के साथ-साथ समाजवादी धारा के प्रतिबद्ध नेता रहे हैं।

सुनील कुमार पुष्पम भी हसनपुर सीट से प्रतिनिधित्व दो बार कर चुके हैं। राजेंद्र प्रसाद यादव साल 1985 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। 2010 में परिसीमन के बाद इस सीट पर लगातार दो बार से जेडीयू का कब्जा है। इस सीट से जेडीयू के राजकुमार राय दो बार जीते हैं, जो यादव जाति से ही आते हैं।

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हसनपुर सीट पर वोटरों की कुल संख्या 2 लाख 40 हजार 948 है, जिसमें यादव मतदाताओं की संख्या ज्यादा है।

आंकड़े भी जान लिजिए

अगर 2015 आंकड़े पर अगर गौर किया जाए तो तत्कालीन प्रत्याशी राजकुमार राय को बहुत मार्जिन से जीत मिली थी। इसलिए हमें ध्यान में रखना है कि 2015 में आरजेडी और जेडीयू संयुक्त रूप से चुनाव लड़ रहे थे। इसलिए अगर अगर 2010 के आंकडो़ं विश्लेषण करें तो पाते हैं कि जेडीयू और बीजेपी के संयुक्त प्रत्याशी राजकुमार राय 36767 वोट मिले थे और प्रतिशत 31.51 वोट मिले थे वहीं आरजेडी के प्रत्याशी सुनील कुमार पुष्पम को 33476 हजार 28.69 प्रतिशत वोट मिले थे। जेडीयू के प्रत्याशी से केवल 3 प्रतिशत कम। अगर 2020 की बात की जाए तो राजकुमार राय अगर यादव वोटों में आधे भी ले गए तो तेजप्रताप के लिए यह सीट मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि 2010 के बाद इस चुनावों में एक नया फैक्टर भी है जो है मोदी फैक्टर । दूसरा फैक्टर है कुशवाहा वोट जो यादवों के बाद दूसरे सबसे बड़ा वोट है हसनपुर विधानसभा में। कुर्मियों और कुशवाहों के सबसे बड़े नेता नीतीश कुमार माने जाते हैं। अगर महागठबंधन में उपेंद्र कुशवाहा होते तो हो सकता था कि कुशवाहा वोट महागठबंधन को जाते लेकिन जो स्थिति बिहार चुनावों में बन रही है उसको देखते हुए लगता है कि कुशवाहा वोट हसनपुर में एनडीए की तरफ चला जाएगा औक निश्चित तौर पर तेज प्रताप की परेशानी बढ़ाएगा।

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