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लाल कृष्ण आडवानी भाजपा को शिखर तक पहुंचने की नींव तैयार करने वाले नेता, फिर भी कुछ अधूरी ख्वाहिशे रह गई

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नई दिल्ली- लाल कृष्ण आडवानी भाजपा के संस्थापक सदस्यों मेें से एक हैं। वो भाजपा की जड़ हैं। उन्होंने भाजपा को अपनी खून-पसीने से सींचा है। आडवानी ने अटल बिहारी वाजपेई के साथ मिलकर जो भाजपा रूपी पौधा लगाया था आज वो वटवृक्ष बन चुका है। बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि जब जनसंघ को कई जनता पार्टी के नेता दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे । तब अटल बिहारी वाजपेई ने लालकृष्ण आडवानी के साथ मिल भाजपा बनाने की परिकल्पना की थी। जब चुनाव चिन्ह चुनने की बात आई तो , लालकृष्ण आडवानी ने कमल चुना । उसी के बाद से अब तक इस पार्टी का निशान कमल बन गया। आज के समय में पार्टी देश पर राज कर रही है।

लालकृष्ण आडवानी की जीवन यात्रा

लालकृष्ण आडवानी  का जन्म अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में 8 नवंबर 1927 को कृष्णचंद डी आडवाणी और ज्ञानी देवी के घर हुआ था। लालकृष्ण आडवानी  भारतीय जनता पार्टी के सह-संस्थापक और वरिष्ठ राजनेता है जो 10वीं और 14वीं लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे। आडवानी  के राजनीतिक करियर की शुरुआत 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक (आरएसएस) के वॉलन्टियर के तौर पर हुई थी। राजनीति के शिखर पर पहुंचे लालकृष्ण आडवानी  को साल 2015 देश के दूसरे सबसे बड़े सिविलयन अवॉर्ड पदम विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्होंने देश के सातवें उप-प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में अपनी सेवाएं भी दी हैं। वो 1998 से लेकर 2004 तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार में गृह मंत्री थे।

लालकृष्ण आडवानी का संघर्ष पथ

1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आरएसएस के साथ मिलकर जिस राजनीतिक पार्टी भारतीय जनसंघ की स्थापना की गई थी। लालकृष्ण आडवानी जनसंघ से जुड़ गए । वह राजस्थान के जनसंघ के जनरल सेक्रेटरी एस.एस. भंडारी के सचिव बने।उसके बाद वह 1957 में दिल्ली आ गए और जल्द ही जनसंघ की दिल्ली इकाई के जनरल सेक्रेटरी और बाद में प्रेसिडेंट बन गए। जनसंघ में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद लालकृष्ण आडवाणी को कानपुर सेशन के दौरान पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में अध्यक्ष बनाया गया। अध्यक्ष के तौर पर आडवाणी ने पहली बार कार्रवाई करते हुए जनसंघ के वरिष्ठ नेता और संस्थापक सदस्य बलराज मधोक पर पार्टी हितों के खिलाफ काम करने के आरोप में कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया था।

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लालकृष्ण आडवानी की जीवन यात्रा

आडवानी की रथयात्रा ने बदली भाजपा की किस्मत

 वर्ष 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से 1986 तक लालकृष्ण आडवानी पार्टी के महासचिव रहे। इसके बाद 1986 से 1991 तक पार्टी के अध्यक्ष पद का उत्तरदायित्व भी उन्होंने संभाला। इसी दौरान वर्ष 1990 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली। हालांकि, आडवानी को बीच में ही  बिहार में गिरफ़्तार कर लिया गया पर इस यात्रा के बाद आडवानी  का राजनीतिक कद और बढ़ गया। 1990 की रथयात्रा ने लालकृष्ण आडवानी की लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया था। हिन्दुत्व के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी को 2 सीटों से 182 सीटों तक पहुंचाने में उनका का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

अधूरी ख्वाहिशें लालकृष्ण आडवानी की

इसमें किसी कोई शंका नहीं है कि लालकृष्ण आडवानी देश का प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी ने उनकी इस ख्वाहिश को पूरा नहीं होने दिया। 2009 में भाजपा ने उनके नेतृत्व में चुनाव भी लड़ा लेकिन वो प्रधानमंत्री की रेस में मनमोहन सिंह से पिछड़ गए। 2014 में नरेंद्र मोदी ने उनकी प्रधानमंत्री बनने की इच्छाओं पर पानी फेर दिया। लेकिन इस सबके बावजूद भी वो देश के ऐसे राजनेता है जिनके दामन पर कोई दाग नहीं हैं। वो एकमात्र राजनेता है जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेई के लिए खुद प्रधानमंत्री की दावेदारी त्याग दी थी। हवाला कांड में नाम आने पर उन्होंने खुद के पाक साफ साबित नहीं होने तक चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। जब 1996 के चुनावों से पहले कांग्रेस के नरसिंह राव ने विपक्ष के बड़े नेताओं को हवाला कांड में फंसाने की कोशिश की थी। उस समय आडवाणी ने सबसे पहले इस्तीफ़ा देकर कहा कि वे इस मामले में बेदाग़ निकलने से पहले चुनाव नहीं लड़ेंगे और 1996 के चुनाव के बाद वे मामले में बरी हो गए।

 

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