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जीतन मांझी के इस मांग से वीआईपी में होगा घमासान, मांग को मंत्री मुकेश सहनी ने भी दिया समर्थन

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पटना – बिहार विधानसभा चुनाव को समाप्त हुए करीब 2 महीनें हो गए लेकिन सियासी सरगर्मियां अब भी उबाल में हैं। बता दें बिहार की मौजूदा सत्ता 4 खंभों पर टिकी हैं, जिसका पूरा ध्यान बीजेपी को ही रखना हैं। अब घटक दलों के बीच एक नया सियासी भूचाल शुरू हो गया हैं।

मालूम हो कि नए सरकार में अभी मंत्रीमंडल का विस्तार होना बाकी हैं, और इसी को ध्यान में रखते हुए जीतन राम मांझी ने एनडीए नेतृत्व से एक और मांग कर दी हैं। मांझी की मांग है कि कैबिनेट में उनके दल का एक मंत्री बनें। बता दें कि पहले से जीतन मांझी के पूत्र संतोष मांझी कैबिनेट मंत्री हैं।

जीतन राम मांझी के इस मांग से बिहार की सियासत में सरगर्मियां बढ़ने लगी हैं। साथ ही एनडीए में टूट का डर भी नेतृत्व को सताने लगा हैं। अब सवाल है कि आखिर मांझी के इस मांग का कौन सा गहरा असर है जिसे लेकर एनडीए में फूट होने के आसार दिख रहे हैं। आपको बता दें कि जीतन मांझी के कैबिनेट में एक और सीट की मांग को लेकर वीआईपी अध्यक्ष व मंत्री मुकेश सहनी ने समर्थन दिया हैं।

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हिन्दुस्तानी अवामी मोर्चा के अध्यक्ष जीतनराम मांझी ने कैबिनेट में एक और सीट मांग कर भाजपा-जदयू से अधिक वीआइपी की परेशानी बढ़ा दी है। अब सहनी पर भी ऐसी ही मांग करने का दबाव बढ़ रहा है। मुश्किल यह है, ये कैबिनेट में एक सीट की मांग करें और वह मिल भी जाए तो बाकी तीन विधायक नाराज हो जाएंगे। वास्तविक खेल तो इसी तीन पर टिका हुआ है। चार सदस्यीय विधायक दल में तीन मर्जी से जिधर चाहें, निकल सकते हैं।

पहले जानिए वीआईपी के अन्दरूनी हालात क्या हैं। जानकारी के मुताबिक वीआईपी के चारों विधायक की अपनी खूद की पहचान हैं। चार में से दो विधायक मिश्री लाल यादव और मुसाफिर पासवान की राजनीतिक शुरुआत राजद से हुई है। ये क्रमश: राजद के विधान पार्षद और विधायक रहे हैं। तीसरे विधायक राजू कुमार सिंह जदयू और भाजपा के विधायक रह चुके हैं। पहली बार विधायक बनीं स्वर्णा सिंह भाजपा पृष्ठभूमि की हैं। इनके ससुर सुनील कुमार सिंह भाजपा के विधान परिषद सदस्य थे। अब ऐसे में इन विधायकों की खूद की पहचान को लेकर कयास है कि वह अपने अपने पृष्ठभूमि पर लौट सकते हैं। अगर उन्हें नाराज किया गया तो।

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वहीं मांझी की पार्टी के विधायकों को यह सुविधा नहीं है। हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के सभी चार विधायक अपने हैं। खुद हैं। पुत्र हैं। समधिन हैं। परिवार से अलग अनिल कुमार हैं। अनिल हर अच्छे-बुरे वक्त में मांझी के साथ रहे हैं। इसलिए उन्हें अधिक तरजीह भी मिल रही है। अब देखना ये है कि मांझी के इस मांग को एनडीए नेतृत्व किस प्रकार हैंडल करते हैं।

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