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राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया बने जयंत चौधरी, चुनौतियों का अम्बार सामने

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नई दिल्ली- पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट राजनीति में आज एक नया बदलाव आया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह ने निधन से राष्ट्रीय लोकदल का अध्यक्ष का पद रिक्त हो गया था। जिस पर आज ऑनलाइन आहूत की गई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जयंत चौधरी को सर्वसम्मति से राष्ट्रीय लोकदल का नया अध्यक्ष चुन लिया गया है। जयंत चौधरी ने अध्यक्ष पद संभालते ही संयुक्त किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए कार्यकर्ताओं से बुधवार को इसमें बड़ी संख्या में भाग लेने का आह्वान किया है। सरकार से मांग की है कि किसानों से वार्ता कर समस्या का जल्द कोई हल निकाले।

चुनौतियां खड़ी हैं सामने

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जाट राजनीति कहीं बिखर सी गई है। जाटलैंड चौधरी चरण सिंह से लेकर चौधरी अजित सिंह तक एक मजबूत दुर्ग था, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से यह पूरी तरह से बिखर गया। बीजेपी के उभार के बाद यहां हालात पूरी तरह से बदले हैं। जाटों ने झोलीभर कर बीजेपी को वोट दिये। जिसकी वजह से संजीव बालियान और सतपाल सिंह जैसे नेता यहां स्थापित हो गए।

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मुजफ्फरनगर लोकसभा में संजीव बालियान ने चौधरी अजित सिंह को मात देकर साबित कर दिया कि जाटलैंड की राजनीति करने वाले अजित सिंह के दिन अब लद गए हैं। इतना ही नहीं, जयंत चौधरी को भी बागपत में मात मिली। ऐसे में अब जयंत चौधरी को दोबारा से अपनी सियासत को मजबूती से खड़ा करना है तो अपने जाट समुदाय को दोबारा से राष्ट्रीय लोकदल के साथ जोड़ने की चुनौती होगी।

पश्चिम यूपी में राष्ट्रीय लोकदल और मुस्लिम समीकरण के सहारे किंगमेकर की भूमिका अदा करती रही है, लेकिन 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद आरएलडी का यह समीकरण पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है। जाट और मुस्लिम अलग-अलग खड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन किसान आंदोलन के बाद पश्चिम यूपी में एक बार फिर दोनों समुदाय एक साथ खड़े दिखे हैं। ऐसे में जयंत चौधरी को अपने पिता और दादा की सियासी विरासत को बचाए रखने के लिए जाट-मुस्लिम समीकरण को साधकर रखना होगा, क्योंकि पश्चिम यूपी में यह दोनों ही समुदाय काफी अहम भूमिका में है।

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किसान आंदोलन बदल देगा जयंत की किस्मत?

जयंत चौधरी राजनैतिक तौर पर बेहद सफल नेता रहे हो ऐसा नहीं है, लेकिन किसी भी नेता की सफलता परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है। पश्चिमी यूपी में फिलहाल जंयत चौधरी के पक्ष की परिस्थितियां निर्मित हो रही है। किसान आंदोलन के बाद पश्चिमी यूपी में जाटों की राजनीति को नई धार मिल रही है। जो जाट-मुस्लिम गठजोड 2013 के दंगों के बाद छिन्न भिन्न हो गया था उसमें नई जा पड़ती दिखाई दे रही है। यूपी में 2022 में विधानसभ चुनाव होने वाले हैं, यह पहले चुनाव होंगे जो जंयत बिना अपने पिता के साये के लड़ेंगे। देखने वाली बात यह होगी कि पश्चिमी यूपी में भाजपा के खिलाफ बन रही हवा को वो अपने पक्ष में कैसे इस्तेमाल करते हैं।

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