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कौन था वो राजा जिसने भारत में खत्म किया चीतों को, फिर कभी भारत में नजर नहीं आए चीता, जानिए सबकुछ

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नई दिल्ली- आजकल पूरे देश में अफ्रीका से चीता लाकर देश में बसाने की योजना की चर्चा खूब हो रही है। क्या आप जानते हैं कि कभी भारत में चीता बहुतायत पाए जाते थे। लेकिन अंधाधुन शिकार की वजह से बिग कैट की यह खास प्रजाति समाप्त हो गई। भारत सरकार ने ऑफिशियली 1952 में यह घोषणा कर दी कि चीता भारत से विलुप्त हो चुके हैं। पूरे विश्व में चीता सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर है। इसकी रफ्तार का अंदाज आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि यह मात्र तीन सेकेंड में सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार कर पहुंच जाता है।

महाराज रामानुज प्रताप सिंहदेव ने किया था 1947 में चीता का अंतिम शिकार

1947 में चीता का अंतिम शिकार किया गया था

छत्तीसगढ़ में कोरिया जिले के महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने 73 साल पहले एक वयस्क चीता और दो शावकों का शिकार किया। उन्होंने इस शिकार की तस्वीरें बॉम्बे नैचुरल हिस्ट्री सोसायटी को भेजी थीं। 1947 में अपने शिकार के साथ खड़े महाराजा की चीतों के साथ यह तस्वीर भारतीय इतिहास में अंतिम साबित हुई। आखिरकार 1952 में सरकार ने अधिकारिक तौर पर चीता को भारत से विलुप्त घोषित कर दिया गया था। उसके बाद भारत में कभी चीता नजर नहीं आया। चीता का अंतिम शिकार कोरिया स्टेट के गांव रामगढ़ में किया गया था।

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अब देश में आ रहे है अफ्रीकी चीता

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इस साल नवंबर में दक्षिण अफ्रीका से 10 अफ्रीकी चीते भारत लाने पर सहमति बन गई है। इनमें 5 नर एवं 5 मादा होंगी। इन चीतों को मध्यप्रदेश के चंबल नदी क्षेत्र में स्थित कूनो नेशनल पार्क में रखा जाएगा। ये चीते एशियाई चीतों से अलग हैं। हमने इनके लिए कूनो राष्ट्रीय उद्यान में बाड़ा बनाने का काम इस महीने से शुरू कर दिया है और अगस्त में बाड़ा बनाने का काम पूरा कर लिया जाएगा। दक्षिण अफ्रीका के चीतों के विशेषज्ञ विन्सेंट वैन डेर मेरवे 26 अप्रैल को कूनो राष्ट्रीय उद्यान में भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ आए थे। आगामी जून-जुलाई में एनटीसीए की टीम भी कूनो का भ्रमण करेगी और तैयारियों का जायजा लेगी। प्रोजेक्ट चीता के तहत अगले पांच वर्षों में करीब 35 से 40 चीतों को देश में लाने की तैयारी है। भारत में अफ्रीकी देश नामीबिया से चीता लाए जाएंगे।

एशिया चीता विलुप्त होने के कगार पर

पिछले 30 वर्षों से विलुप्त हो चुके चीतों को फिर से बसाने के प्रयास किए जा रहे हैं। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने चीतों को फिर से बसाए जाने की योजना पर रोक लगा दी। जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ अफ्रीका से चीता लाने को हरी झंडी दिखा दी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मामले को देखने के लिए एक कमिटी भी बनाई गई है। इस प्रोजेक्ट में नामीबिया के चीता कंजर्वेशन फंड ने मदद की पेशकश की है। संस्था की फाउंडर और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डॉ. लॉरी मार्कर ने इस बारे में पहली बार 2009 में भारत सरकार से बात की थी। उन जगहों को देखने के लिए वह भारत भी आईं, जहां चीतों को बसाने की हुई । फिलहाल भारत में अफ्रीकी चीतों की प्रजाति को बसाने की बात चल रही है। वहीं कभी भारत में पाए जाने वाले एशियाई मूल के चीतों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। 1947 के बाद भारत में कभी भी एशियाई प्रजाति का कोई चीता नजर नहीं आया है। एशियाई मूल के 50 से साठ चीते ईरान के खुरासान प्रांत में बचे हुए। कई बार पाकिस्तान में भी चीतों को देखने की बात कही गई है, लेकिन कोई ऑफिशियली डेटा उपलब्ध नहीं है।

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