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स्पाईवेयर टेक्नोलॉजी ‘पेगासस’ से भारत में 300 लोगों की जासूसी! जानिए, क्या है पेगासस, कब, कहां कैसे हुआ जासूसी

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नई दिल्ली – दुनिया भर में पेगासस सॉफ्टवेयर (Pegasus Spyware) द्वारा 50 हजार लोगों की जासूसी का मामला सामने आया हैं। भारत में भी “पेगासस” स्पाईवेयर की जासूसी का मुद्दा तेज पकड़ता जा रहा हैं, अब तक भारत में 300 लोगों की जासूसी की बात कहीं जा रही हैं जिसमें पेगासस (Pegasus Spyware) द्वारा फोन की टैपिंग, हैकिंग, फोटो, कंटेक्ट, गैलरी की निगरानी जैसे जासूसी कारनामे का मामला सामने आया हैं। जासूसी के शिकार लोगों में सरकार में शामिल मंत्री, विपक्ष के नेता, पत्रकार, वकील, जज, कारोबारी, अफसर, वैज्ञानिक और एक्टिविस्ट शामिल हैं।

इस अंतरराष्ट्रीय ग्रुप में भारत का न्यूज पोर्टल द वायर भी शामिल था, जो जासूसी में टारगेट बने भारतीयों के नाम सामने लाया है। अब तक की जानकारी के अनुसार 38 पत्रकार, 3 प्रमुख विपक्षी नेता, 2 मंत्री और एक जज का नाम सामने आया है।

द वायर के एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन का कहना है कि NSO अपने प्रोडक्ट पेगासस (Pegasus Spyware) का लाइसेंस सिर्फ लोकतांत्रिक देशों में चुने हुए सरकारों को देता है। भारत सरकार का कहना है कि उसने पेगासस का इस्तेमाल नहीं किया। तो अब सवाल है कि अगर भारत सरकार ने पेगासस प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल नहीं किया तो किसने भारतीय पत्रकारों, जजों, नेताओं और अफसरों की जासूसी कराई? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसकी जांच करानी चाहिए।

पेगासस सॉफ्टवेयर क्या हैं?

पेगासस सॉफ्टवेयर (Pegasus Spyware) की डीको़डिंग और उसके अध्ययन के लिए दुनिया भर से 17 मीडिया संस्थानों के जर्नलिस्ट का एक ग्रुप हैं। जो एनएसओ (NSO) ग्रुप और उसके सरकारी ग्राहकों की पड़ताल कर रहा है। इजराइल की कंपनी NSO सरकारों को सर्विलांस टेक्नोलॉजी बेचती है। इसका प्रमुख प्रोडक्ट है- पेगासस, जो एक जासूसी सॉफ्टवेयर या स्पायवेयर है।

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पेरिस के नॉन-प्रॉफिट जर्नलिज्म ऑर्गेनाइजेशन “फॉरबिडन स्टोरीज” और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पास 2016 से NSO के ग्राहकों द्वारा टारगेट के रूप में चुने गए 50,000 से अधिक फोन नंबरों की जानकारी पहुंची थी। कब और कैसे, इसकी कोई जानकारी इन संगठनों ने नहीं दी है। तब उसने यह जानकारी गार्जियन, वॉशिंगटन पोस्ट समेत 17 न्यूज ऑर्गेनाइजेशन के साथ शेयर की। पिछले कुछ महीनों से इन मीडिया ऑर्गेनाइजेशन के 80 से अधिक पत्रकारों ने इस डेटा पर काम किया। इनके बीच कोऑर्डिनेशन का काम फॉरबिडन स्टोरीज का था।

दैनिक भाष्कर रिपोर्ट के मुताबिक अब तक लीक हुआ डेटा में 50,000 से अधिक फोन नंबरों की एक लिस्ट है। यह नंबर उन लोगों के हैं, जिनकी 2016 के बाद से अब तक NSO के सरकारी ग्राहकों ने जासूसी कराई। इन्हें ही NSO ने पेगासस (Pegasus Spyware) का सर्विलांस लाइसेंस बेचा था। डेटा में सिर्फ समय और तारीख है, जब इन नंबरों को सर्विलांस के लिए चुना गया या सिस्टम में दर्ज किया गया था। डेटा के आधार पर कुछ नंबरों का सैम्पल निकालकर ग्रुप के पत्रकारों ने टारगेट्स से मोबाइल फोन लिए। उनके हैंडसेट की फोरेंसिक जांच एमनेस्टी की सिक्योरिटी लैब से कराई, जो इस प्रोजेक्ट में टेक्निकल पार्टनर बना।

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जो नंबर लीक हुआ क्या उसकी जासूसी हुई?

लेकिन अब तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि जिन नंबरों का डेटा लीक हुआ उनकी जासूसी की गई या नहीं। पत्रकारों के कंसोर्टियम का कहना है कि लीक हुआ डेटा सर्विलांस के लिए पहचाने गए टारगेट्स बताता है। इससे सिर्फ इतना पता चलता है कि इन लोगों के फोन को इन्फेक्ट करने को कहा गया था। दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि पेगासस जैसे स्पायवेयर ने इन मोबाइल नंबरों की जासूसी की कोशिश की है या नहीं। जासूसी हो सकी या नहीं, यह भी इस डेटा से पता नहीं चलता।

जो डेटा मिला है, उसमें कुछ लैंडलाइन नंबर भी हैं। इस पर NSO का कहना है कि इनकी निगरानी टेक्निकली असंभव है। पर कंसोर्टियम का दावा है कि यह नंबर टारगेट्स में शामिल थे, भले ही पेगासस से इन पर हमला हुआ हो या नहीं।

हालांकि, सूची में जो नंबर शामिल हैं, उनके मोबाइल फोन के छोटे सैम्पल की फोरेंसिक जांच हुई है। इसमें लीक हुए डेटा में पेगासस (Pegasus Spyware) की एक्टिविटी शुरू होने का जो वक्त और तारीख लिखी थी, उसके अनुसार ही एक्टिविटी देखने को मिली है। इससे यह नहीं कह सकते कि इन फोन की जासूसी हुई भी या नहीं। इतना जरूर कह सकते हैं कि इन नंबरों को अलग-अलग सरकारों ने जासूसी के लिए चुना था।

NSO ग्रुप का क्या कहना है?

NSO ग्रुप पहली बार विवादों में नहीं पड़ा है। दरअसल, पेगासस प्रोजेक्ट 2016 में शुरू हुआ था और तब से ही यह स्पायवेयर विवादों में रहा है। NSO ने दोहराया है कि उसकी ग्राहक सरकारों ने किसे टारगेट किया, इसका डेटा उसके पास नहीं रहता।

NSO ने तो अपने वकीलों के माध्यम से कहा है कि पत्रकारों के कंसोर्टियम के दावे गलत हैं। 50,000 नंबरों का आंकड़ा भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। जो सूची जारी हुई है, वह सरकारों के टारगेट्स हैं ही नहीं। कंसोर्टियम को जो डेटा सामान्य तौर पर उपलब्ध था, उसका अपने मनमुताबिक एनालिसिस किया और अब उसे डेटा लीक कहकर सनसनी फैलाई जा रही है।

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