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किसान आंदोलन – कितना नुकसानदायक साबित होगा भाजपा के लिए यूपी विधानसभा चुनावों में किसानों की भूमिका

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नई दिल्ली- 2022 भाजपा के लिए भाग्यशाली साबित होगा या दुर्भाग्य ! इस सवाल का जबाव तो अभी भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है मगर इसके जवाब भी तलाशा जा रहा है। 2022 में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है। लेकिन इन पांच राज्यों में सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा(UP Election) चुनावों पर पूरी दुनिया की नजरें होगी। यह पहली बार होगा कि कोई साधु अपने पांच साल के कार्यकाल पूरा करने के बाद अपने काम के नाम पर वोट मांगने के लिए जनता के बीच होगा। यूपी विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी से लेकर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की परीक्षा का समय होगा।

अगर बीजेपी फिर से यूपी में सरकार बनाने में कामयाब रहती है तो यह भाजपा और योगी नेतृत्व पर मोहर लगने जैसा होगा। अगर भाजपा 2022 यूपी विधानसभा चुनाव हार जाती है तो 2024 लोकसभा में भाजपा नेतृत्व के लिए परेशानी खड़ी हो जाएगी इसलिए 2022 यूपी विधानसभा चुनाव (UP Election) पूरे पार्टी नेतृत्व के लिए करो या मरो जैसी स्थिति है। लेकिन फिलहाल परिस्थिति भाजपा के पक्ष में नजर नहीं आ रही है। पंजाब से शुरू हुआ किसान आंदोलन यूपी में भाजपा के गले के फांस बन सकता है। जब से राकेश टिकैत (Rakesh tikait) आंदोलन के नेता के तौर पर उभरे हैं तब से यूपी में भाजपा की परेशानी बढ़ती नजर आ रही है। भाजपा लाख राकेश की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े करे, लेकिन वो पश्चिम यूपी में प्रभावी नहीं हैं ऐसा कहने में हर राजनेता कई बार सोचेगा।

मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान जो जाट मुस्लिम गठजोड़ टूटा था वो किसान आंदोलन (Farmer Protest) की वजह से दोबारा से बन रहा है। मुसलमान भी इस बात को समझ रहे हैं कि पश्चिमी यूपी में अगर जाट बीजेपी के साथ चला गया तो फिर बीजेपी को हराना मुश्किल हो जाएगा इसलिए मुसलमान नेताओं तो 2014 के मुजफ्फरनगर दंगों(Muzaffarnagar riot) की यादों पर मिट्टी डालने से कोई परहेज नहीं है। जाट अगर बीजेपी को 2022 में वोट नहीं देता है तो फिर बीजेपी के लिए 2022 के राह नामुमकिन लगती है।

जाटों के लिए बीजेपी ने किया क्या

भाजपा नीति फिलहाल समझ के बाहर है कि वह जाटों के अपने पाले में वापस लाने के लिए किस रणनीति पर अमल करने वाली है या फिर भाजपा सरकार फिलहाल जाटों कोई भाव देना नहीं चाहती है भाजपा के संगठन में न को जाटों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। न ही सरकार में जाटों की कोई भागीदारी नजर आ रही है ऐसे में यह कहना मुश्किल है जाटों के सरकार अपने पाले में कैसे खींचेगी। हाल में यूपी से भाजपा के आठ राज्यसभा सदस्यों को चुना गया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभावी जाटों में क्या किसी को भी भाजपा ने राज्यसभा के लिए योग्य नहीं पाया। या फिर बीजेपी जाटों को राजनैतिक तौर पर अछूत बना देना चाहती है।

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क्या है भाजपा की रणनीति

दरअसल भाजपा और संघ रणनीतिकार एक बड़ी रणनीति पर काम कर रहे हैं। दिल्ली के आसपास इलाकों में जाट एक प्रभावी समूह के रूप में पहचाने जाते हैं, और लगातार खेती-किसानी एवं राजनैतिक मुद्दों पर विभिन्न सरकारों को चैलेंज करते रहे हैं। ऐसे में भाजपा के रणनीतिकार जाट राजनीति को ही खत्म करने पर काम कर हैं। जाट अभी राजनैतिक तौर पर सबसे कमजोर हैं इसलिए भाजपा किसी भी जाट नेता को आगे बढ़ा कर जाट समाज को उसके पीछे लामबंद होने का अवसर नहीं देना चाहती है। भाजपा और संघ के रणनीतिकार मान रहे हैं कि अगर जाट राजनैतिक तौर पर फिर से सबल हुए तो भाजपा के लगातार केंद्र में सरकार बनाने के सपने को सबसे पहले चैलेंज करेंगे, ऐसे में भाजपा फिलहाल जाटों को राजनैतिक तौर पर सबल नहीं होने देगी।

अगर भाजपा पश्चिम यूपी में हारती है तो यह जाटों को राजनैतिक कमबैक होगा।

भारतीय राजनीति में खेती-किसानी से सम्बंध रखने वाली जातियोंं में सबसे प्रभावी जाति रही है। देश के कई बड़े नेता इस जाति में पैदा हुए हैं। लेकिन जाटों का राजनैतिक वर्चस्व धीरे धीरे समाप्ति ओर जा रहा है। लेकिन किसान आंदोलन ने इसमें एक नई जान फूंक दी है। पहले किसान आंदोलन को सिखों का आंदोलन कह कर कमजोर साबित करने की कोशिश की गई। जब राकेश टिकैत आंदोलन के नेता बन कर उभरे तो फिर ऐसे जाटों का आंदोलन पेंट करने की कोशिश की गई। लेकिन बीजेपी समर्थकों के द्वारा जितना इस आंदोलन को महत्वहीन बताने की कोशिश की गई किसानों ने इतना ही इसका विरोध किया।

किसान आंदोलन भाजपा के लिए खतरे की घंटी

2014 के मुजफ्फरनगर दंगों के बात जिस जाट समाज ने एक तरफ बीजेपी को वोट किया था। भाजपा ने उसकी राजनैतिक हिस्सेदारी को एक तरह से खत्म करने का काम किया है, यहीं से भाजपा के लिए खतरे की शुरूआत होती है कि जाट समाज भाजपा की इस रणनीति को समझ रहा है। कि उसे राजनैतिक तौर पर कमजोर करने की मुहिम चल रही है। अगर यह बात गांव गांव तक पहुंच जाती है तो फिर 2022 का सपना भाजपा के लि मुश्किल खड़ी कर देगा।

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