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अफगानिस्तान का नया राष्ट्रपति हिब्तुल्लाह अखुंदजादा – तालिबान सरकार में शरिया का चीफ जस्टीस से लेकर राष्ट्रपति तक.. पढ़े हिब्तुल्लाह की पूरी कहानी

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नई दिल्ली – तालिबान ने राजधानी काबुल को कब्जा में लेकर लगभग पूरे अफगानिस्तान पर फतेह हासिल कर लिया है। अफगानिस्तान में नई सत्ता की शुरूआत हो गई हैं, हिब्तुल्लाह अखुंदजादा ने राष्ट्रपति की कमान संभाल ली हैं। इधऱ राष्ट्रपति अशरफ गनी और उप राष्ट्रपति अमीरुल्लाह सालेह ने देश छोड़ दिया है। तालिबान ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जे के बाद हिब्तुल्लाह अखुंदजादा को अमीर अल मोमिनीन, यानी अफगानिस्तान का राष्ट्रपति घोषित कर दिया है।

अरबी में हिब्तुल्लाह का मतलब होता है ईश्वर का तोहफा। अपने नाम के उलट हिब्तुल्लाह अखुंदजादा ऐसा क्रूर कमांडर है जिसने कातिलों और अवैध संबंध रखने वालों की हत्या करवा दी और चोरी करने वालों के हाथ काटने की सजा फरमा दी। आइए जानते हैं हिबतुल्लाह के जिंदगी की पूरी कहानी…

हिब्तुल्लाह के पिता मस्जिद के इमाम थे, उन्हीं से मिली तालीम

साल 1961 के आस – पास हिब्तुल्लाह अखुंदजादा अफगानिस्तान के कंधार प्रांत के पंजवई जिले में पैदा हुआ। वह नूरजई कबीले से ताल्लुक रखता है। उसके पिता मुल्ला मोहम्मद अखुंद एक धार्मिक स्कॉलर थे। वो गांव की मस्जिद के इमाम थे। उनके पास न तो जमीन थी, न कोई संपत्ति। मस्जिद में मिलने वाले दान के पैसों और अनाज से घर चलता था। हिब्तुल्लाह अखुंदजादा ने अपने पिता से ही तालीम हासिल की।

सोवियत सेना के अतिक्रमण के बाद उठा लिए हथियार

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1980 के शुरुआती दिनों में अफगानिस्तान में सोवियत यूनियन की सेना की धमक थी। उसी के संरक्षण में अफगान सरकार चल रही थी। कई मुजाहिदीन सेना और सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे। इन मुजाहिदीनों को अमेरिका और पाकिस्तान से मदद मिलती थी। हिब्तुल्लाह अखुंदजादा का परिवार पाकिस्तान के क्वेटा चला गया और उसने हथियार उठा लिए।

साल 1989 तक सोवियत यूनियन ने अपनी आर्मी वापस बुला ली। इसके खिलाफ लड़ने वाले लड़ाके अब आपस में ही लड़ने लगे। ऐसा ही एक लड़ाका मुल्ला मोहम्मद उमर था। उसने कुछ पश्तून युवाओं को साथ लेकर तालिबान आंदोलन शुरू किया। उसमें हिब्तुल्लाह अखुंदजादा भी शामिल हो गया।

अखुंदजादा के मदरसे में पढ़ते थे 1 लाख से ज्यादा तालिबानी

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साल 1996 में जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा जमाया उस वक्त अखुंदजादा को फराह प्रांत के धार्मिक विभाग की जिम्मेदारी मिली। बाद में वो कंधार चला गया और एक मदरसे का मौलवी बन गया। ये मदरसा तालिबान फाउंडर मुल्ला उमर चलाता था जिसमें 1 लाख से ज्यादा स्टूडेंट पढ़ते थे।

साल 1996 में अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हो गया। हिब्तुल्लाह अखुंदजादा को इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान में शरिया अदालत का चीफ जस्टिस बनाया गया। चीफ जस्टिस रहते हुए अखुंदजादा ने सालों तक क्रूर सजा के आदेश दिए। जैसे- हत्यारों और अवैध संबंध रखने वालों की हत्या का आदेश और चोरी करने वालों के हाथ काट देना। वो फतवा जारी करने के लिए जाना जाता है। फतवों के मामले में मुल्ला उमर और मुल्ला मंसूर दोनों तालिबान चीफ अखुंदजादा से सलाह मशविरा करते थे।

2001 में अमेरिकी हमले के बावजूद डटा रहा

7 अक्टूबर 2001 को अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया। सभी तालिबानी नेता तितर-बितर हो गए। कोई मारा गया, कोई पकड़ा गया तो कोई पाकिस्तान का रूख कर लिया। इस दौरान हिब्तुल्लाह अखुंदजादा अफगानिस्तान में ही डटा रहा। माना जाता है कि इस दौरान उसने ज्यादा यात्राएं नहीं कीं।

मुल्ला मंसूर की मौत के बाद बना तालिबान का चीफ कमांडर

तालिबान के फाउंडर मुल्ला मोहम्मद उमर 2013 में बीमारी से मर गया। उसके बाद हकीमुल्लाह मसूद ने तालिबान की कमान संभाली, लेकिन 2013 ड्रोन अटैक में उसकी भी मौत हो गई। 2015 में तालिबान ने मुल्ला मंसूर को अपना नया नेता चुने जाने की घोषणा की। मई 2016 में ड्रोन हमले में मुल्ला मंसूर की भी मौत हो गई।

25 मई 2016 को हिब्तुल्लाह अखुंदजादा को तालिबान की कमान सौंपी गई। माना जाता है कि मंसूर अपनी वसीयत में इसका नाम लिखा था। हिब्तुल्लाह अखुंदजादा की नियुक्ति तालिबान के बड़े नेताओं ने पाकिस्तान के क्वेटा में की थी। हालांकि रहबरी शूरा, यानी तालिबान काउंसिल के सभी मेंबर्स वहां मौजूद नहीं थे। एक तबके को हिब्तुल्लाह अखुंदजादा के लीडर बनने से आपत्ति थी, लेकिन कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा सका।

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